जैसे वक़्त के डॉक्टर, टीचर वैद्य की जरूरत, ऐसे ही मुक्ति मोक्ष के लिये वक़्त के जीवित सन्त सतगुरु की जरूरत

जयगुरुदेव
-बालाघाट मध्यप्रदेश

जैसे वक़्त के डॉक्टर, टीचर वैद्य की जरूरत, ऐसे ही मुक्ति मोक्ष के लिये वक़्त के जीवित सन्त सतगुरु की जरूरत

आध्यात्मवाद क्या है, सन्तमत क्या है- इसका भेद बताने वाले उज्जैन के पूज्य संत बाबा उमाकान्त जी महाराज जी ने 11 फरवरी 2021 को बालाघाट, मध्य प्रदेश से अपने सतसंग में गुरु की महिमा और वक़्त के जीवित गुरु की ज़रूरत समझाते हुए बताया कि गुरु जब जाने लगते है तो अपना चार्ज दूसरे को दे देते है। फिर वो सम्हाल करते है। इसीलिए कहा गया कि जिस प्रकार वक़्त के डॉक्टर, टीचर और वैद्य की ज़रूरत होती है उसी प्रकार वक्त के गुरु, वक़्त के संत की ज़रूरत होती है।

सन्त जीव को जब नामदान देते हैं तो काल से जीव की डोरी को अपने हाथ ले लेते हैं

संतमत के जो लोग हो, सुने होगे सत्संग में। जब सन्त जाने लगते हैं, जैसे कोई अधिकारी होते हैं, जाते समय अपना चार्ज दूसरे को दे देते हैं, ऐसे ही संत होते हैं तो जाते समय अपना चार्ज दूसरे को दे देते हैं। यह भी आपने सुना होगा कि काल के हाथ से जीव की डोरी को अपने हाथ में ले लेते हैं और गुरु पद पर बांध देते हैं। शरीर छोड़ कर चले जाते हैं तो बराबर उस वक्त जो काम करने वाला होता है उसके पास प्रेरणा दे कर के भेजते जाते हैं। एक के बाद दूसरा फिर तीसरा चार्ज देते चले जाते हैं।

जैसे कोई वैद्य, हकीम, डॉक्टर संसार से चले गये और कोई कहे हम उनसे ही इलाज कराके ठीक हो जाएंगे तो कैसे हो सकते है?

तो संभाल करने वाले की जरूरत रहती है। अब अगर कोई यह कहे कि धन्वंतरि बहुत अच्छे वैद्य थे, नब्ज पकड़ते ही रोग को पकड़ लेते थे, एक ही जड़ी से सब को ठीक कर देते थे, उनकी जड़ी रसायन का काम करती थी। अब कोई कहे कि हम उनसे इलाज करा करके और मर्ज को अपने ठीक कर लेंगे तो ऐसा कैसे कर सकते हैं? मौजूदा वैद्य के पास, मौजूदा डॉक्टर के पास जाना पड़ता है। मौजूदा अध्यापक के पास, शिक्षक के पास विद्या पढ़ने के लिए, अध्ययन करने के लिए जाना पड़ता है। ऐसे ही आध्यात्मिक विद्या है। जो इसका ज्ञान कराता हो उसकी बातों को मानना ही पड़ता है। ये करके आप देख लेना। अभी तक जो भी आपने किया, आपको जो गुरु मिले उन्होंने आपको जो भी बताया है, उसको आपने किया। अब उसके साथ एक इसको भी जोड़ लो। इसको भी करके देख लो। अगर आपको फायदा लाभ होता है तो हम तो कहते हैं आप इसी को करोगे। जैसे एक दुकान अगर खोले और वो कम चलती हो, फिर दूसरी खोल दे और वो ज्यादा चलने लगे तो फिर व्यक्ति दूसरी ही चलाता है। तो ऐसे ही समझ लो। आप स्त्री और पुरुष हो, 7-8 साल के बच्चे हो कोई भी कर सकते हो, सबके लिए छूट है।

पहले औरतों को तो नाम दान देते ही नहीं थे। साधन भजन पूजा का अधिकार ही नहीं दिया जाता था तब क्या था?

एकइ धर्म एक व्रत नेमा।
कायँ बचन मन पति पड़ प्रेमा।।

पति की सेवा करके, पति की पूजा करके पार हो जाया करती थी औरतें। अब तो पति अपने ही पार होने का नहीं कर पा रहा है तो औरतों को क्या पार करेगा? इसलिए इधर करीब 700 वर्षों से संतो की दया औरतों पर भी बरसते, मिलने लग गई। इनको भी नामदान मिलने लग गया और बहुत सी औरतों ने संत गति को प्राप्त कर लिया। संतो का काम तो यह नहीं करती हैं, किसी ने नहीं किया। वह तो पुरुष से ही करते हैं लेकिन गति को प्राप्त कर लिया।

रानी इंदुमती ने साधना करके देखा कि कबीर साहब जी सृष्टि को चला रहे हैं

रानी इंदुमती कबीर साहब की शिष्या थी। वो सचखंड तक गई और देखा जब वहां साधना में कि कबीर साहब बैठे हुए हैं और यही सृष्टि को चला रहे हैं तब बोली आप हमको मृत्युलोक में बता दिए होते कि मैं ही सब कुछ हूं तो मुझको इतनी मेहनत न करनी पड़ती। तब उन्होंने कहा तुझको विश्वास न होता कि मनुष्य शरीर में भी इतनी शक्ति हो सकती है। तू रानी भोग के लिए ही पैदा हुई, तू स्वर्ग-बैकुंठ की आत्मा, तुझको वहां भेजा गया सुख मिलेगा। बगैर मेहनत के तुम इसको समझती तो तुझको मैंने रास्ता दिया, रास्ते पर चलाया और लाकर के जलवा दिखाया। बोल तेरी मदद किया कि नहीं किया? तब चरणों पर गिरी, बोली आप के मदद के बगैर तो मैं एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकती थी, कदम कदम पर आपने मेरी मदद किया।

बिना सतगुरु के कोई राह न पाई। लौट-लौट चौरासी आई।।

आप लोग इसमें जो संतमत के जीव जो हो, सत्संग सुने हो, अगर कोई आध्यात्मिक सत्संग सुनाने वाला आपको मिला होगा आपको पता होगा कितनी रुकावट आती हैं, कितनी दिक्कतें आती हैं। लेकिन गुरु जब बांह पकड़ लेते हैं तब नहीं छोड़ते हैं। यहां भी मदद करते हैं और वहां भी मदद करके पहुंचाया करते हैं। ये मन जल्दी नहीं रुकता है, जन्म जन्मांतर का भागने का आदि हो गया। अब आपको उसको रोकने की कोशिश करनी पड़ेगी। यही मन को रोकने की, सन्तमत की साधना है।