देश के लिए मेडल जीतकर या देश-देश चिल्लाकर और तिरंगा लहराकर कोई राष्ट्रवादी नहीं साबित होता

देश के लिए मेडल जीतकर या देश-देश चिल्लाकर और तिरंगा लहराकर कोई राष्ट्रवादी नहीं साबित होता।

पहलवान सुशील कुमार ने सच में बहुत दुःखी किया है सबको। जब आपने देश का गौरव बढ़ाने का काम किया हो, हजारों- लाखों युवाओं के आप प्रेरणास्रोत हों, ऐसे में आपकी जिम्मेदारी देश के लिए और बढ़ जाती है। फिर भी ऐसे लोग पावर की हनक में, अपने अहंकार में चूर होकर शक्तिमान सीरियल के जैकाल बनने से नहीं चूकते। जिस पहलवान सागर का मर्डर हुआ, वो भी किसी का बेटा होगा, अपने मां और पिता के आंखों का तारा होगा। फिर क्यों ऐसी घटनाएं होती हैं। अभी पिछले साल सुशांत सिंह राजपूत के मर्डर का मामला भी दब सा गया है। अपराधियों के हौंसले बुलंद हैं। ऐसे में क्या सुशील कुमार अपराधी सिद्ध हो पाएगा! बड़ा प्रश्न है। जबकि उसके खिलाफ दिल्ली पुलिस के पास ठोस सबूत हैं। एक बात और जब अपराध इतने बड़े स्तर पर भी पूरे सिस्टम के पोर पोर में घुन की तरह घुसा हुआ है तो आम आदमी के लिए न्याय पाना तो इस जीवन में संभव प्रतीत नहीं होता। पूरे सिस्टम में बड़े बदलाव की आवश्यकता को महसूस किया जा सकता है। ऐसा नहीं कि इन सबका मन बढ़ाने में केवल सत्ता और सरकार के लोग ही हैं। हम जैसे आम आदमियों का भी बड़ा हाथ है। जब तक हम विराट कोहली, सुशील कुमार जैसे खिलाड़ियों या नेताओं की गाली पर ताली बजाते रहेंगे, उनका मनोबल और अहंकार तो बढ़ेगा ही। इतना बढ़ जायेगा कि किसी निर्दोष की जान लेकर ही मानेगा या किसी उभरते हुए नवयुवक का कैरियर खत्म करके ही मानेगा। वैसे किसी का करियर खत्म करना भी मर्डर करने के ही समान है। अपने देश में चाहे कोई पार्टी हो या संस्था ईमानदारी से चयन बहुत कम ही होता है, अगर हो भी जाए तो चयनित खिलाड़ी या सदस्य कोल्डड्रिंक की बोतल ढोता हुआ, अपने सीनियर की चाकरी करता हुआ दम तोड़ देता है। उसे अपनी प्रतिभा को दिखाने और साबित करने का अवसर कम ही मिल पाता है। इसके विपरीत कम प्रतिभावान चाटुकारों को अवसर की कोई कमी नहीं रहती। यह एक बड़ी विडंबना है। मैं चाहता हूं कि सुशील कुमार के मामले में पूरी ईमानदारी से करवाई हो। नहीं तो यहां अगर बेईमानी होती है तो देश जैसा कुछ बचा नहीं रह जाएगा।

     *लेखक*

पत्रकार आशीष तिवारी
आँवला (बरेली)