समय-परिस्तिथि देखकर सेवा करो लेकिन नाम ध्वनि और भजन नहीं छोड़ना है-बाबा उमाकान्त जी महाराज

जय गुरु देव

दिनांक: 14 जून 2021
स्थान: बाबा उमाकान्त जी महाराज आश्रम, उज्जैन, म.प्र.

समय-परिस्तिथि देखकर सेवा करो लेकिन नाम ध्वनि और भजन नहीं छोड़ना है-बाबा उमाकान्त जी महाराज

विश्वविख्यात परम् सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज उज्जैन ने बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के वार्षिक भंडारा के शुभ अवसर पर यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम (jaigurudevukm) के ऑनलाइन माध्यम से 8 जून 2021 को प्रसारित प्रात: कालीन सतसंग में बताया कि प्रेमियों! नाम ध्वनि का कार्यक्रम समय परिस्थिति के अनुसार बराबर चलता रहेगा। जहाँ कोरोना है, कोई तकलीफ-परेशानी है, सरकार की तरफ से रोक-टोक है तो इकट्ठा होकर मत करना। अपने-अपने घरों में बराबर करते रहना। यदि अनुकूल वातावरण है, कोई दिक्कत नहीं है तो सप्ताहिक सत्संग और मासिक बैठक इकट्ठा होकर करना।

समय-परिस्थिति देख करके सेवा भी करना है लेकिन नाम ध्वनि और भजन नहीं छोड़ना है।

प्रेमियों! नियम-कानून का पूरा पालन करना। अपनी बचत रख कर के कोई काम करना। सेवा के लिए जो आपको बताया गया, भोजन खिलाने का, आप देख लो, वहां कोई दिक्कत न हो, कोरोना या कोई बीमारी न हो, मौसम अनुकूल हो। समझो कि बरसात आ रही है तो थोड़ी देर रुक जाओ। समय-परिस्थिति देख करके सेवा भी करना है लेकिन नाम ध्वनि और भजन जहां भी रहो वहां भी कर सकते हो, उसको नहीं छोड़ना है।

ऑनलाइन अपनी लाइन नहीं है, ऑनलाइन का काम अपना काम नहीं।

ऑनलाइन न कोई सत्संग होगा न नाम ध्वनि होगी। आप 4-6 आदमियों को जोड़ करके मीटिंग कर सकते हो लेकिन ऑनलाइन का कोई भरोसा नहीं है, कब क्या कोई चीज डाल दे, क्या सुन ले, यह लाइन कब रुक जाए। यह लाइन आपके लाइन से अलग की लाइन है। आप इतने लोग हो गए हो, आपकी लाइन एक मानव श्रंखला लंबी लग जाए कि देश के एक कोने से दूसरे कोने तक, 36 घंटा न लगेगा, उससे कम में संदेश पहुंच जाएगा।

लिखा-पढ़ी का काम पक्का है। मानव श्रंखला से पूरे भारत में सन्देश पहुँच सकता है।

पहले हम लोग ऐसे ही करते थे। गुरु महाराज जी का कोई संदेशा आता था, चिट्ठी आती थी। एक चिट्ठी तो गुरु महाराज की और दूसरी जिम्मेदार आदमी की। जैसे आई हमारे पास एक चिट्ठी, हम अपनी तरफ से लिखें और दूसरी गुरु महाराज जी की चिट्ठी की नकल किया। चले गए पास के गांव में साइकिल से, देकर के आए और उनसे कह दिया पास के गांव में दे देना। वह गांव में गया 24 घंटे में मानव श्रंखला जिसको कहते हैं, उससे संदेश पहुंच जाता था। आप समझो वो काम पक्का होता है। यह काम दिखावे का काम है जो थोड़ी देर आदमी देखा या सुना। बस वहीं तक सीमित रह जाता है।

कंप्यूटर-मोबाइल का भरोसा नहीं, आमने-सामने बार-बार बताने से बात रट जाती है।

दरवाजे-दरवाजे पर जो बैठकर के लोगों को समझाया जाता है, आमने-सामने जो बात बताई जाती है, वह बात याद रहती है। बार-बार बताने से बात को पकड़ लेता है। फेरियां लोग निकालते थे, जाते थे दरवाजे के सामने से, स्वास्थ भी सही रहता था, घुटने की बीमारी, गैस और बहुत सी बीमारीयां ठीक हो गई लोगों की। नारा लगाते हुए चले जाते। एक आदमी निकला दरवाजे पर, कहता है रोज कहते हो शाकाहारी हो जाओ तो चलो छोड़ दिया। अब मत आना यहां, हमारी तरफ प्रचार मत करना। आज से हमारे घर में नहीं आएगा, नहीं खाएंगे, इधर प्रचार करने की जरूरत नहीं है, बाबा लोग उधर प्रचार करो। ऐसा भी होता है अंदर से प्रेरणा हो जाती है। अंदर से संस्कार उससे जग जाते हैं। इस तरह का सिस्टम बनाओ। कंप्यूटर का, मोबाइल का कोई भरोसा नहीं। लेकिन लिखा-पढ़ी का पक्का भरोसा है। अनपढ़ लोग भी दिमाग में जो भर लेते थे तो हमेशा याद रहता था। वह चीज खत्म नहीं होती है।

मीठा खाने से स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है।

बुढ़ापे में स्मरण शक्ति कम होती है जब मीठी चीज आदमी मन के मुताबिक खाने लगता है और मेहनत नहीं करता है। तब वह भूलने लगता है। बहुत सारी बातें आज तो बताई नहीं जा सकती हैं, कमजोरी थोड़ी हमको ज्यादा भी है। बोलता हूं, मेहनत करता हूं तो तकलीफ हो जाती है। मालिक की दया होगी तो धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी। निराश नहीं हूं। शरीर से तो निराशा आती है लेकिन हिम्मत हैं, मन-चित में काम करने का उल्लास और इच्छा है।