जयगुरुदेव नाम एक अस्त्र है, इसको धारण करो। दूसरे को भी बता दो जिससे उसकी भी रक्षा हो जाये

जयगुरुदेव
16.6.2021
बाबा उमाकान्त जी महाराज आश्रम, उज्जैन मध्य प्रदेश

जयगुरुदेव नाम एक अस्त्र है, इसको धारण करो। दूसरे को भी बता दो जिससे उसकी भी रक्षा हो जाये।

वक़्त के पूरे सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 2 अप्रैल 2020 को उज्जैन आश्रम से यूट्यूब चैनल पर प्रसारित सतसंग में भक्तों को जयगुरुदेव नाम की शक्ति के बारे में बताते हुए सन्देश दिया कि यह जयगुरुदेव नाम, आपको एक शस्त्र पकड़ा दिया गया है। शस्त्र को देखकर कर ही बहुत से लोग घबरा जाते हैं। जैसे आपको मैंने बताया रावण के हथियार को देखकर के देवता डर जाते थे, लड़ाई के मैदान में नहीं आते थे। ऐसे ही जयगुरुदेव नाम है। आप इस शस्त्र को धारण किए रहो, लोगों को बता दोगे तो उनकी भी रक्षा होगी और आप की भी रक्षा होगी।

मनुष्य शरीर छूटने के बाद बुरे कर्मों की माफी नहीं, यमराज के यहां सिर्फ सजा मिलती है।

यह भी हमको मालूम है कि कितने घरों में नामध्वनि हो रही है, कितने घरों में ध्यान भजन लोग कर रहे हैं, सब मालूम है। चलो ठीक है अब शुरू कर लो। माफी का समय होता है और समय निकलने के बाद कोई माफी नहीं होती। जब तक यह शरीर है, माफी होती है क्योंकि गलती इंसान इसी शरीर से करता है और माफी भी इसी शरीर से मांगी जाती है। जो बुरे कर्म बन जाते हैं अच्छे कर्म बना करके काटे जाते हैं। लेकिन शरीर जब छूट जाता है और वहां पर जीव जब पेश किया जाता है तो कर्मों के अनुसार यमराज, धर्मराज जिनको कहते हैं वह माफ करने वाले नहीं होते हैं। कितना भी कोई चिल्लाए, माफी नहीं होती है। डांट अलग से लगाते हैं कि अब माफी मांग रहे हो, माफी का वक्त तुम्हारे पास बहुत था जब मनुष्य शरीर में थे लेकिन अपने धर्म, बल, मान, प्रतिष्ठा के घमंड में रह गए। उस वक्त पर तुमने किसी की बात सुना नहीं, सत्संग में, संतों के पास गए नहीं और समरथ गुरु कि तुमने तलाश नहीं किया, उनके बताए रास्ते पर चले नहीं, अब तो तुम को माफी नहीं होगी, अब तो तुम को सजा भोगनी पड़ेगी। तो फिर नर्क में जाना पड़ता है।
इसलिए आपको चेतने की जरूरत है कि भाई अब इस मानव शरीर में दोबारा आना न पड़े और नर्कों में जाना न पड़े। इसी जन्म में अपना काम बन जाए।

कर्मों को लेने-देने के लिए जुड़ते हैं परिवार में, शरीर छूटने के बाद कर्म बंधन हो जाता है यहीं खत्म

परमात्मा की अंश जीवात्मा है। वह परमात्मा में जाकर विलीन हो जाए, हम मुक्त हो जाएं, हमारी जीवात्मा को मुक्ति मिल जाए, इस संसार मे दोबारा आना न पड़े। क्योंकि एक दूसरे के साथ कर्मों का लेना-देना रहता है। लेने-देने के लिए ही परिवार में जुड़ते हैं। पिछले जन्मों का लेना-देना होता है। इससे भी मुक्ति मिल जाए क्योंकि शरीर छूटने के बाद कर्मों का बंधन है, खत्म हो जाता है, लेना-देना जो परिवार का, एक दूसरे का है, यह खत्म हो जाता है। तो दोबारा न आना पड़े, ऐसा काम इस जीवन में हो जाए।

प्रेमियों! आने वाली भयंकर तकलीफों से बचत के लिए मालिक से प्रार्थना करो कि लोग सुधर जाएं।

गुरु महाराज से यही प्रार्थना की जाए, हम भी यही बराबर प्रार्थना करते रहते हैं, आप सब लोगों के लिए भी करते रहते हैं, जो नामदानी नहीं हैं, अनजान हैं, अज्ञानी हैं, उनके लिए भी यही प्रार्थना करते रहते हैं कि इनको आप सद्बुद्धि दीजिए। आपके ही बच्चे हैं। आप तो परमात्मा रूप हो गए, आप तो सत्पुरुष के तदरूप हो गए उनके पास पहुंच गए, आप इन पर दया करो।
प्रेमियों को भी अकल और बुद्धि दो। यह भी न सोचे कि हम अपने लिए ही पैदा हुए हैं, अपने परिवार वालों, हित मित्रों, रिश्तेदारों के लिए ही पैदा हुए हैं। इनको भी अकल आए कि भाई दूसरे की मदद करने के लिए ही मनुष्य शरीर मिला है। परमारथ के काज यह शरीर मिला है तो इससे कोई परमार्थ हो जाए। दूसरे को ज्ञान दे दिया जाए, इनको सुधार दिया जाए, यह सही रास्ते पर आ जाए और जो सजा इनको बीमारी के रूप में, आंधी तूफान के रूप में, ओले-पत्थर के रूप में, धरती हिलने, भूकंप के रूप में आ रही है और आगे भयंकर रूप में आएगी, उससे बचाव हो जाए। क्योंकि अकाल मृत्यु से प्रेत योनि में जाना पड़ता है। प्रेत योनि बड़ी कठिन होती है। प्रेत बनते ही प्रेतों का मार पड़ने लगती है। पेट बहुत बड़ा, मुंह बहुत छोटा, पेट भरता ही नहीं, भूख से व्याकुल रहता है। बड़ी खराब योनि होती है।

प्रेमियों! इसी जन्म में लोग अपने घर अपने मालिक के पास पहुंच जाये- यह निशाना बनाओ

महाराज जी ने बताया कि जैसे सांप की, बिच्छू की योनि होती है, जान बचाते फिरते रहते हैं। जहर भरा हुआ रहता है, ऐसे ही प्रेत योनि होती है, बड़ी दुखदाई। उसमें न जाना पड़े, इसी जन्म में आप सब लोगों का काम बन जाए और लोगों का भी काम बन जाए, अपने घर पहुंच जाएं, यही निशाना बनाने की जरूरत है।