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जयगुरुदेव

20.6.2021
जयगुरुदेव बाबा उमाकान्त जी महाराज आश्रम, उज्जैन, म.प्र.

सच्चे सन्त सतगुरु से नामदान मिलने पर मुक्ति मोक्ष मिलना आज भी संभव है-बाबा उमाकान्त जी महाराज

विश्व विख्यात परम संत बाबा उमाकांत जी महाराज जी ने नाम दान की महिमा बताते हुए भक्तों को संदेश दिया कि डॉक्टर जब दवा देता है तो परहेज बताता है और पहरेज न करो और दवा खाते जाओ तो दवा फायदा नहीं करती, मर्ज खत्म खत्म नहीं होता। मर्ज को अगर खत्म करना है तो परहेज करना पड़ेगा, मानव मंदिर को साफ-सुथरा रखना पड़ेगा। इसमें मांस-मछली मत डालना तभी इससे पूजा-उपासना कबूल होगी नहीं तो होने वाली नहीं है। कितना भी आप दिखावे का काम करलो या मन से कर लो धार्मिक काम या अनुष्ठान कर लो, उसका लाभ मिलने वाला नहीं है। इसलिए इसको गंदा मत करना, अंडा-मांस मत खाना, शराब मत पीना और दूसरे के औरत के साथ बुरा कर्म अब मत करना। यह चीज आप याद कर लो रट लो।

शाकाहारी सदाचारी रहकर साधना करके अपने अंतर में नाम रूपी मणि जगा लो।

आप देखो सदाचारी शाकाहारी आप हो जाओगे आप का मन फिर लगने लग जाएगा। नाम दान देते समय धुलाई-सफाई तो होती है, गंदा न हो बर्तन तो नाम रूपी मणि अंदर में जल जाती है, उसका प्रकाश अंदर और बाहर दोनों दिखाई पड़ता है। अंधेरा खत्म हो जाता है। इस चीज का आप ध्यान रखना। अभी तक जो गलती हो गई, हो गई। उसके लिए कान पकड़कर माफी मांग लो उस मालिक से कि हम से जान-अनजान में गलती बन गई। अब हम गलती नहीं करेंगे। मांस-मछली मत खाना, अंडा-शराब का सेवन मत करना, दूसरी औरत के साथ बुरा कर मत करना – यही आपकी है सबसे बड़ी दक्षिणा।

सन्त कबीर साहब ने भी कहा कि अंतर में ही तो सब कुछ है।

दीक्षा मंत्र लेते हैं गुरु से तो दक्षिणा देते हैं। कुछ लोग तो पहले ही रखवा लेते हैं लोटा-धोती-अनाज। यह सब ले आओ तब कंठी बांधते हैं, कान फूंकते है। यहां तो कान फूकने, कंठी बांधने का काम नहीं है। कबीर साहब ने कहा:
कंठी बांधे हरि मिले तो बंदा बांधे कुंडा।
पत्थर पूजे हरि मिले तो बंदा पूजे पहाड़।।

उन्होंने यह भी कहा:
संध्या तर्पण न करहु, गंगा कबहु न नहाऊ।
हरि हीरा अंतर बसे, वाहु नीचे छांऊ।।

उन्होंने कहा अंतर में ही तो सब कुछ है।
यही घट भीतर सात समंदर, याहि मलमल नहाओ।
मन मोरा विदेशवा ना जाओ घर ही है चाकरी।।

आप अभी नहीं देख पा रहे हो, नहीं विश्वास कर रहे हो, जब देख लोगे तो सारी बातों को आप अपने मुंह से ही बोलने लग जाओगे। कहोगे सत्य है, बिल्कुल ऐसा है।

अपने बुरे कर्मों की दो दक्षिणा। इसे करोगे तो लाभ स्पष्ट दिखेगा।

आप इस बात को समझो आपसे कुछ नहीं मांगा जा रहा है। लेकिन दक्षिणा आपको अपने बुरे कर्मों की देनी चाहिए। आज आपके लिए मौका है। तो बुरे कर्म अब मत करना। पुराने लोग पूजा-पाठ में लगे हुए हो, उसको आप छोड़ दो – मैं इस बात को क्यों कहूं? मैं इस बात को क्यों कहूं कि आपने जो गुरु कर रखा है उनका सम्मान न करो, उनकी इज्जत ना करो? रोटी खिलाना, पानी पिलाना – यह तो भारतीय संस्कृति रही है। पुण्य का काम होता है। इससे यह काम तो करना ही चाहिए। दरवाजे पर कोई आ जाए तो कहा गया अतिथि देवो भव:। देवता के तरह से उसकी सेवा करनी चाहिए। तो उसके लिए मैं क्यों मना करूं? लेकिन इस बात का विश्वास है मुझे, कि जिस तरह से कोई दुकान खोलता है और दुकान चलती है। कोई दूसरा बोल दिया कि उस चौराहे पर दुकान खोल लो, वहां पर ज्यादा अच्छी चलने लगेगी। दूसरी दुकान चौराहे पर खोल लेता है और वो दुकान जब पहली दुकान से ज्यादा अच्छी चलने लगती है, आमदनी ज्यादा होने लगती है तो पुरानी दुकान बंद कर देता है।

इस गुड्डे-गुड़िया के खेल में मत फसों, जीते जी मोक्ष प्राप्त करने का जतन करो।

अब मैंने भी बंद कर दिया। एक तरह से मैं भी तो फंसा हुआ था। यही दुनिया की पूजा-पाठ, वही तंत्र-मंत्र में मैं भी फंसा हुआ था। लेकिन जब गुरु महाराज मिल गए और गुरु महाराज ने दया किया तो उसको गुड़िया-गुड्डे का खेल समझने लगा। जैसे छोटी बच्ची होती है, गुड़िया गुड्डे का खेल खेलती है। गुड़िया का ब्याह गुड्डे से कराती है, बनाती है, खिलाती है, उसको ससुराल भेजती है। लेकिन जब उसकी शादी हो जाती तो गुड़िया-गुड्डे के खेल को बंद कर देती है। यह गुड़िया-गुड्डे का खेल आप बहुत से लोग कर रहे हो न जानकारी में फंसे हुए। इसको अपने आप छोड़ दोगे। मैं यह नहीं कहता हूं इसी को करना। उसी के साथ इसको भी जोड़ लेना। जो आपका गृहस्थी का काम है, जो पेट के करने में लगे हुए हो, उसी में से थोड़ा सा समय अपने शरीर को चलाने वाली आत्मा के लिए भी निकाल लेना।

जयगुरुदेव
परम् सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज उज्जैन (म.प्र)भारत