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सतगुरु ही असली देवी-देवताओं की कराते हैं पहचान-बाबा उमाकान्त जी महाराज

जीते जी इसी मनुष्य मंदिर से देवी-देवताओं और परमात्मा का साक्षात्कार कराने वाले वर्तमान के पूरे संत सतगुरु बाबा उमाकान्त जी महाराज ने भक्तों को संदेश दिया कि गुरु ही परमात्मा का बोध कराते हैं। आप जिनको मानते हो, मूर्ति को या जो बनकर बैठ गए हैं, आप यह समझो अगर वह साक्षात आपके सामने खड़े हो जाएं, आप तो वही समझोगे जैसे कैलेंडर में फोटो छपा हुआ है, यह वाला हीरो है यह फला हीरोइन है, यह देवी का, देवता का भेष बना करके बैठ गए, यह वही हैं।

असली देवी-देवता आ जाये तो आप पहचान नहीं कर पाओगे। जब गुरु बता देंगे तब कर पाओगे पहचान

असली विष्णु भगवान अगर आपके सामने आ करके खड़े हो जाएं, असली देवी-देवता आपके सामने आकर के खड़े हो जाएं तो आप विश्वास नहीं करोगे। लेकिन जब गुरु बता देते हैं कि इस तरह का उनका रूप है, इस तरह की उनकी आवाज है, इस तरह का आंख और कान है, इस तरह से उनके शरीर से तेज निकलती है, रोम-रोम में उनके प्रकाश है। अगर वैसा आपको दिखाई पड़ जाएगा तब आप विश्वास कर लोगे।

17 तत्वों का लिंग शरीर होता है देवी-देवताओं का और 17 तत्वों का ही होता है भूत-प्रेतों का

आपको पिछले सतसंगों में, जो पुराने लोग हो सुनाया गया है कि इस 17 तत्वों के लिंग शरीर में देवता भी रहते हैं और 17 तत्वों के लिंग शरीर में प्रेत भी रहते हैं। तो देवता भी दिखाई पड़ जाते हैं और प्रेत भी दिखाई पड़ जाते हैं। प्रेत कभी देवता का रूप बना लेते हैं तो कभी जानवरों का, कभी शेर, कभी घोड़ा हाथी का रूप बना लेते हैं। उनको रंग रूप बदलने में देर नहीं लगती है। जैसे कहीं नाटक हो रहा हो। नाटक का कलाकार क्या होता है? कभी राम बन जाता है कभी कृष्ण तो कभी रावण बन जाता है। आदमी तो एक ही है, रूप बदल जाता है, स्थान बदल जाता है। ऐसे प्रेत आत्माएं होती हैं। उनकी पहचान होती है। देवता की जैसे पहचान होती है।

यह काल भगवान का देश है। ये सब है उनकी नाटकशाला, यहां मत फसो

देवता अगर मनुष्य शरीर में दिखाई भी पड़ जाएंगे तो उनका पैर जमीन पर नहीं पड़ेगा। प्रेतों की जो एड़ी होती है वह आगे होती है और पंजा पीछे होता है। यह सब पहचान है और पहचान पाओगे तब तो उनको समझ पाओगे। अगर नहीं पहचान पाओगे तो समझो कॉल भगवान का यह देश है। जीवों की नाटक शाला है। यहां पर नाटक करने के लिए, नाटक दिखाने के लिए उन्होंने यह सब बना रखा है।