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जय गुरु देव

6.7.2021
पटना, बिहार

बन्दहुँ सन्त समाज – इस कलयुग में सन्त वंशावली

जीवों को नामदान देकर असली घर सतलोक तक पहुंचाने वाले वक्त के पूरे सन्त सतगुरु बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 28 फरवरी 2021 को पटना, बिहार में आयोजित व यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम (Jaigurudev UKM) पर प्रसारित लाइव सतसंग में भक्तों को संतो की महिमा का वर्णन करते हुये बताया कि धरती के प्रथम संत कौन थे? कबीर साहब जी थे। हर तरह से उन्होंने जो कुरीति में लोग फंसे हुए थे उससे निकालने की कोशिश किया। कबीर साहब ने नामदान लिया पूरे संत बन गये। कैसे? अपने बल पर बने। नाम तो यही था लेकिन यह पांचों नाम नहीं था उस समय। तीन नाम इनके गुरु ने इनको दिया था। लेकिन यह कोशिश करते रहे। जैसे कुछ विद्यार्थी होते हैं, रिसर्च करते जाते हैं, उसमें नई खोज कर लेते हैं। ऐसे ही इन्होंने मेहनत बहुत किया और अपनी आत्मा को सतलोक पहुंचाया।

सतपुरुष के 16 सुतों में एक- जोगजीत ही कबीर थे

नीचे सोलह सुतों में से एक जोगजीत, वो आए थे। गए सतलोक तो भेद सतलोक का खोला, रास्ता सतलोक तक का बताया लेकिन जब शरीर छोड़ा तब अपने लोक में ही चले गए।

कबीर साहब ने गुरु नानक जी को नामदान दिया

प्रेमियों इस बात को समझो उन्होंने बहुत लोगों को रास्ता बताया लेकिन अधिकार किसको दिया? जाने से पहले नामदान देने का अधिकार किसको दिया? नानक साहब को रावी नदी के तट पर। नामदार लिया था, कम उम्र में परम गति की प्राप्ति कर ली थी फिर उन्होंने जब गुरु के रूप को अंतर में देखा, गुरु के जलवा को देखा तब बोल पड़े वाहेगुरु वाहेगुरु वाह रे मेरे गुरु। हमारे गुरु का इतना जलवा हैं।

जीवित में कदर कम लेकिन जाने के बाद मूर्तियां, मठ बनाते हैं

देखो हाड़-मांस के शरीर में कोई समरथ गुरु को, संतों को, महापुरुषों को पहचान पाता है? नहीं पहचान पाते हैं। जब चले जाते हैं तब जगह-जगह रामलीला, रासलीला करते हैं, मूर्ति बनाते हैं, जगह-जगह मठ-मंदिर उनके नाम से बना लेते हैं। जब रहते हैं तो जल्दी नहीं पहचान पाते। अगर आदमी समझने की कोशिश करे, उनके बताए रास्ते पर चले तब तो पहचान होती है।

सिक्खों के दसों गुरुओं के बाद मराठा परिवार में दिया नामदान

आप यह समझो उनको (नानक जी) अधिकार दिया था। फिर उन्होंने जो दस गुरु हुए थे, शिष्य तो बहुत बनाये थे, उनको अधिकार देते चले गए। गुरु गोविंद सिंह गए हुए थे दक्षिण भारत में। इधर पूना पहुंचे जब, वहां मराठा परिवार के रतन राव जी, उनको अधिकार दिया। उन्होंने भी बहुत से शिष्य बनाएं, बहुत लोगों को नामदान दिया लेकिन अधिकार किसको दिया? श्याम राव जी को दिया। श्याम राव जी को वहां लोगों ने परेशान करना शुरू कर दिया।

संतों को परेशानी बहुत झेलनी पड़ती है

क्योंकि अक्सर यह देखा गया है संतो को परेशानी बहुत झेलनी पड़ती है। बहुत परेशान लोग करते हैं। पलटू साहब जी ने कहा

पलटू नाहक भूकता साध देखकर स्वान।
जगत भगत सो बैर है चारों जुग परमान।।

राधास्वामी मत इन्होंने शुरू किया

तो इधर आए बनारस में कुछ दिन रहे। फिर हाथरस चले गए। फिर उन्होंने गरीब साहब को नामदान दिया, अधिकार दिया। उन्होंने किसको दिया? शिव दयाल जी को जिन्होंने यह राधास्वामी मत को चलाया। राधास्वामी में राधा माने सुरत और स्वामी माने वो मालिक।

राधा नाम सुरत का सतगुरु देई लखाय।
और उलट ताय सुमरन करें स्वामी संग मिलाय।।

उलट का क्या मतलब होता है? जैसे कहा न

उल्टा नाम जपत जग जाना।
बाल्मीकि भयै ब्रम्ह समाना।।

उल्टा नाम जपने का क्या मतलब है

उल्टा नाम का मतलब क्या होता है? लोग कहने लग गए- मरा मरा मरा जपो। मरा जपने से कोई ब्रह्म समान हो सकता है? उलट आप समझो कि जीवात्मा का जो यह प्रकाश, रोशनी, ताकत है इस पिंड की तरफ हो गया। इधर से खींचो, समेटो। इसकी पूरी ताकत को, यहां जीवात्मा जो बैठी है (दोनों आंखों के मध्य), वहां लाओ फिर ऊपर की तरफ ध्यान दो। स्वामी संग मिलाएं – फिर वह स्वामी मिल जाएगा।

बाबा जयगुरुदेव ने जीवों को न केवल जगाया बल्कि निज घर भी पहुंचाया

राधास्वामी नाम उन्होंने जगाया। उन्होंने फिर किसको अधिकार दिया? नामदान तो बहुत लोगों को दिया लेकिन उन्होंने अधिकार दिया विष्णु दयाल जी महाराज को। विष्णु दयाल जी महाराज ने किसको दिया अधिकार? घूरेलाल जी महाराज को। घूरेलाल जी महाराज ने किस को अधिकार दिया? हमारे गुरु महाराज (बाबा जयगुरुदेव) को। दादा गुरु ने हमारे गुरु महाराज को अधिकार दिया। इन्होंने बहुत से लोगों को नामदान दिया। गुरु के आदेश का पूरा पालन किया, तनिक भी संकोच नहीं किया, तनिक भी बेईमानी नहीं कि और अपने आखिरी स्वांस तक लगे रहे इसी काम में और इतने जीवों को नामदान दिया। अंतर में इतनी धुलाई लोगों के कर्मों की किया की आखिरी वक्त में उन्हीं कर्मों की वजह से शरीर के ऊपर जो कर्म आए तकलीफ झेलना पड़ा। लेकिन मेहनत पूरा किया और रास्ता ही नहीं बताया, रास्ते पर ही नहीं चलाया बल्कि कितने ही जीवों को निज घर पहुंचा दिया जो अब वापस इस दु:ख के संसार में आने वाले नहीं हैं।

वर्तमान के पूरे सन्त सतगुरु बाबा उमाकान्त जी महाराज
बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने वर्ष 2007 में खुले सतसंग मंच से बाबा उमाकान्त जी महाराज को नामदान देने और जीवों को पार लगाने का अधिकार दिया। ये भी अपने गुरु के आदेश में देश-विदेश घूम-घूम कर सतसंग व नामदान लुटाते हुए प्रेमियों का लोक और परलोक दोनों बना रहे हैं।