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विदेशों, बड़े शहरों, गरीबों के झोपड़-पट्टीयों, पहाड़ों, दुर्गन्ध वाली जगहों पर भी जाकर देता हूं नामदान

झारखंड सन्तमत के प्रणेता, जीते जी ईश्वर-ख़ुदा के दर्शन-दीदार का रास्ता बताने वाले, जिनके माध्यम से ही अब स्रष्टि का कल्याण होगा, वो उज्जैन के पूज्य सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 23 फ़रवरी 2021 को रांची, झारखण्ड में दिए व यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर प्रसारित सतसंग में नाम की महिमा का वर्णन करते हुए सुनाया कि गुरु के आदेश से मैं नामदान दे देता हूँ। मैं तो दुर्गम जगहों पर भी जाता हूँ जहां पर जल्दी कोई जाता ही नहीं। पहाड़ों पर भी गया। दिन में कमाते, शाम को क्या खाते हैं? आप उनका खाना देखोगे तो आप फिर समझोगे कि हमही सबसे ज्यादा अमीर और धनवान है। वो तो बेचारे हमसे भी गरीब हैं। वहां भी मैं गया, नामदान दिया बड़े-बड़े शहरों में, तीर्थ स्थानों पर गया वहां पर भी नामदान दिया। 16 देशों में गया, छोटे कमरे में कम संख्या में लोग बैठ गए, वहां पर भी नामदान दिया, सब जगह नामदान देता हूं।

नामदान क्यूँ दे देता हूँ

क्यूंकि आदमी घर से निकले तो कोई गारंटी नहीं है कि 2 घंटे के बाद घर में वापस आ जाएगा। अगर आज उसको नामदान नहीं दिया, कल उसकी उम्र खत्म हो गई, समय उसका निकल जाएगा। आज अगर पूरी बात नहीं भी समझ पाया, पहली बार ही आया, थोड़ा ही सुना, पूरा समझ नहीं पाया, कल समझ जाएगा। करने तो लगेगा। करने लगेगा तो फायदा उठा लेगा। इसलिए सब को नामदान देता हूं।

नामदान देना बहुत कठिन क्योंकि जीवों के पूर्व जन्मों और वर्तमान के कर्मों को लेना पड़ता है

नाम दान देना कोई आसान काम नहीं है, बड़ा कठिन काम है। गुरु महाराज जाने से पहले मेरे लिए कह कर गए थे कि यह पुरानों की संभाल करेंगे, नए को नामदान देंगे। तो गुरु के आदेश का पालन करना पड़ रहा है। गुरु महाराज के जाने के बाद मन फिर आगे-पीछे कर कर रहा था, इच्छा ही नहीं हो रही थी कि नाम दान दिया जाए। लेकिन फिर आदेश हो गया कि नाम दान देना शुरू कर दो, यह भजन करने लगेंगे, शरीर छूट भी गया तो मनुष्य शरीर मिल जाएगा। मनुष्य शरीर का पाना ही मुश्किल है।

कोटि जन्म जब भटका खाया।
तब यह नर तन दुर्लभ पाया।।

कर्मों के अनुसार लाखों-करोड़ों वर्षों तक नर्कों में रहना पड़ता है। कीड़ा, मकोड़ा, सांप, बिच्छू आदि के शरीर में बंद होना पड़ता है। 9 महीना मां के पेट में उलटा लटकने के बाद फिर मिलता है। फिर हाथ पैर किस तरह के मिल गए कि लूला लंगड़ा अंधा पैदा हो जाते, कैसे कुछ सुन पाओगे, देख पाओगे, कैसे कान में उंगली लगाकर भजन कर पाते, तो यह मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से मिलता है।

बड़े भाग्य मानुष तन पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन गावा।।

आप शहंशाह के बेटे हो, अपने को छोटा मत समझो

इसलिए सब को नाम दान देता हूं। छोटी-बड़ी सब जगहों पर जाता हूं। देखो आप अपने को छोटा मत समझो। आप अपने को बड़ा ही समझो। शहंशाह के जो बेटा होते हैं, बादशाह के वह छोटे नहीं होते है। वो तो राजकुमार होते हैं। आप तो गुरु के बंदे हो, गुरु के बंदे होकर अपने को छोटा कहते हो?

ग्रहस्थ जीवन में ही 22 घंटे शरीर के लिए और 2 घंटे अपने आत्म कल्याण के लिए समय निकालो

नाम दान के लिए आपको न घर छोड़ना रहेगा, न बाल-बच्चों को छोड़ना। आप खेती-गृहस्थी का जो काम करते हो, मेहनत-ईमानदारी से करो। 22 घंटा अपने शरीर के लिए जो काम करते हो, वह करो। और 2 घंटा अपनी आत्मा के लिए समय निकाल लेना तो इसमें आपका परलोक बनने का रास्ता निकल जाएगा। देखो न किसी का सिर मुंडवाता हूं, न दाढ़ी-बाल बढ़वा रहा हूं, न साधु बनवा रहा हूँ न कपड़ा न किसी का जाति-धर्म – कुछ नहीं। हमारे यहां तो केवल मानव धर्म है, मानव है, इंसान है, इंसानियत है। कोई भी हिंदू मुसलमान सिख ईसाई ब्राह्मण क्षत्रिय – यहाँ कुछ नहीं है। जो हमारे पास आते हैं, कोई किसी से कुछ पूछता नहीं है। यहां पर तो केवल एक मानव धर्म है।

जो प्रभु से प्रेम करता है, वो उनके सभी जीवों से भी प्रेम करता है

भगवान ने इंसान बनाया, इंसान धर्म बनाया। हड्डी, मांस, खून सबका एक जैसा, आंख-कान, टट्टी-पेशाब का रास्ता सबका एक जैसा बनाया। उसकी तरफ से कोई भेदभाव नहीं। जीवात्मा सबकी एक जैसी है। दोनों आंखों के बीच में बैठी है। जो प्रभु-परमात्मा को जानता है, परमात्मा की अंश जीवात्मा को भी जानता है। तो जो प्रभु से प्रेम करता है, हर जीवों से भी प्रेम करता है। गोस्वामी जी ने कहा:

सियाराम मय सब जग जानी।
करहुं प्रनाम जोरि जुग पानी।।

मैं सबको अपना मानता हूं, प्रेम करता हूं क्योंकि सबमें परमात्मा की रूह है

मैं सबको प्रेम करता हूं। आप जितना प्रेम करते हो, प्रेमियों नाम सुनकर के ही आ रहे हैं, दुनिया में जो प्रेम मिला, उससे कहीं ज्यादा, आपसे बहुत ज्यादा, कई गुना ज्यादा आपसे प्रेम करता हूं। आप यह समझो मैंने आपको याद किया तब आप आये मेरे पास। आप यह मत सोचो कि हम याद करके इनके पास आये हैं।