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जय गुरु देव

17.07.2021

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

फोटो व मूर्ति पूजा से मुक्ति-मोक्ष नहीं मिलता, वो तो सन्त ही देते हैं

उज्जैन:नामदान देकर जीवों को मृत्यु से पहले मुक्ति-मोक्ष प्राप्त करने का रास्ता बताने वाले वर्तमान के पूरे सन्त सतगुरू बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 31 दिवसीय दुख निवारण काफिले के समापन पर 22 नवंबर 2017 को ग्वालियर में सतसंग में बताया कि आप अगर यह सोचो की मूर्ति या फोटो की पूजा करके पार हो जाएंगे तो यह संभव नहीं है। कभी कोई इस तरह का इतिहास नही मिलता है बल्कि लोगों ने तो इसका खंडन किया है। कबीर साहबजी ने कहा:

पत्थर पूजै हरि मिले तो बंदा पूजै पहाड़।
कंठी बांधै हरि मिले तो बंदा बांधै कुंडा।।

जब महापुरुष चले जाते हैं तब उनको लोग याद करते हैं। जो उनके नजदीक पहुंच जाते हैं, उनको तो लाभ मिलता है लेकिन जो उनके ऊपर शंका करते रहते हैं वो उनसे दूर रहना पसंद करते हैं। लेकिन लोभी,लालची किस्म के लोग जगह-जगह पर मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर बनवा देते हैं, मूर्ति-फोटो लगा देते हैं और वहां पर लोगों को फंसा देते हैं।

राम-कृष्ण ने जो काम किया, उनके इतिहास को याद दिलाने की जरूरत है

लेकिन वह मूर्ति-फोटो किस लिए बनाया? ताकि यादगार बनी रहे कि उन्होंने ऐसा काम किया। राम की कथा सुनाते, राम का इतिहास बताते, रामलीला, रासलीला होती है हर साल, राम जन्म कृष्ण जन्म होता है, कृष्ण लीला होती है लेकिन जो उन्होंने काम किया उस काम को करने की जरूरत है। पिता के आदेश पर देखो राजगद्दी पर ठोकर मार दिया। भाई-भाई के लिए जंगल चले गए। सीता के इतिहास को याद दिलाना है। अगर वह चाहती तो हनुमान जी के साथ लंका से निकल कर के चली आती लेकिन मर्यादा का उन्होंने पालन करते हुए उनके साथ आना उचित नहीं समझा।

एकै धर्म एकै व्रत नेमा।
काय वचन मन पद-पद प्रेमा।।
पति का पद ही सब कुछ था। मर्यादा और पति ही सबकुछ उनके थे। इन चीजों को समझाने और बताने की जरूरत होती है।

जब महापुरुष काम करके चले जाते हैं तो उनकी याद में लोग रामलीला, कृष्णलीला करते हैं कि उनका नाम न खत्म हो

मूर्तियां लोगों ने बाद में बनाई जब महापुरुष चले गए यादगार के लिए कि उनका नाम न खत्म हो जाए। रासलीला रामलीला इसलिए कि उनकी याद बनी रहे। उन्होंने अच्छा काम किया था, धर्म की स्थापना इन्होंने किया था। कबीर साहब ने कहा है:

दुनिया ऐसी बावरी पत्थर पूजै जाय।
घर की चाकी कोई न पूजै जिसका पीसा खाय।।

घट में है सुझै नहीं लालच ऐसी जिन।
और इस संसार को भया मोतियाबिंद।।

जब कैमरा चला तो फोटो बन गया। अब फोटो खींचने लग गए। फोटो किसका बनता है जो राम-कृष्ण बन करके बैठ जाता है। चाहे दिन में राम-राम कहता हो और शाम को ढाई सौ ग्राम पीता हो। लेकिन अगर वो राम-कृष्ण बन करके बैठ जाए तो उसका फोटो खिंच जाएगा, कैलेंडर छप जाएगा तो उसी को मान लेते हैं कि यही भगवान है, यही मुक्ति-मोक्ष देंगे।

ईट-पत्थरों, पहाड़ों, नदी-तालाबों में मुक्ति-मोक्ष खोजना समय को बर्बाद करना है

तो मोटी बात तो मैं आपको बताऊंगा ही। जो मूर्ति पूजा करने वाले हो, फोटो कैलेंडर को सब कुछ मानने वाले हो आपको खराब लग रहा होगा। पहले मुझे भी खराब लग रहा था लेकिन जब मेरे समझ में आ गया कि यह गुड़िया और गुड्डा का खेल है। जैसे बच्ची गुड़िया-गुड्डे का खेल खेलती है, गुड़िया बनाती है, खिलाती है, उसकी शादी करती है गुड्डा से फिर ससुराल भेजती है। लेकिन जब उसकी खुदकी शादी हो जाती है तब गुड़िया-गुड्डे का खेल नहीं खेलती। जब मेरे ही समझ में आया कि वह तो गुड़िया-गुड्डे का खेल था, असली पति तो कोई और है, वह परमेश्वर है। जब यह समझ में आ गया तो मैंने भी वह गुड़िया-गुड्डे का खेल छोड़ दिया।

बहुतों को पता ही नहीं कि शाकाहारी रहना चाहिये। कई जगह पंडित मुल्ला पुजारी सब खाते है

बहुत से लोग ऐसे हैं जिनको यही नहीं पता है कि शाकाहारी रहना चाहिए। क्योंकि प्रचार करने वाला ही कोई वहां पर नहीं है। जो पंडित मुल्ला पुजारी प्रतिष्ठित लोग हैं, वे लोग भी खाते-पीते हैं। आप चले जाओ बंगाल, उड़ीसा, असम, नागालैंड, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश- बहुत खाते पीते हैं। जब तक जानकारी नहीं होती है तब तक आदमी उसी में लिप्त रहता है। जानकारी भी कराना जरूरी होता है। तो आज आप लोगों जानकारी करा दे रहा हूं। सोचो की मूर्ति-फोटो की पूजा कर लेंगे और लोगों को करा देंगे और उसी से हमारा मुक्ति-मोक्ष हो जाएगा और हम दूसरों का मुक्ति-मोक्ष करा देंगे तो यह संभव नहीं है।

यह जीवात्मा चेतन है। चेतन से चेतन की पूजा करेंगे तब वह मालिक मिलेगा

यह शरीर जड़ है और जीवात्मा चेतन है और वह मालिक चेतन है। चेतन से जब चेतन की पूजा करेंगे तब वह मालिक मिलेगा। जब रूहानी इबादत होगी, जिस्मानी ख्वाहिशों की इबादत खत्म होगी तब वह रहमान मिलेगा, अल्लाह ताला, पाक परवरदिगार जिसका नाम लोगों ने रखा तब वह मिलेगा। ये भेद सतगुरु ही बताते हैं।