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पूरे सन्त सतगुरु मिले बिना उद्धार, मुक्ति मोक्ष नहीं हो सकता

जोधपुर राजस्थान संतमत की थ्योरी के साथ साथ प्रैक्टिकल भी पूरा करवाने वाले वर्तमान के पूरे सन्त सतगुरु बाबा उमाकान्त जी महाराज ने अपने जोधपुर स्थित आश्रम से 16 जुलाई 2019 को यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर उपलब्ध सतसंग में गुरु की महिमा बताते हुए कहा कि भारत देश हमेशा से गुरुओं का देश रहा है। कहा भी गया है-

गुरु बिन भव निधि तरे न कोई।
जो विरंच शंकर सम होई।।

चाहे ब्रह्मा, विष्णु या शिव के समान कोई होगा लेकिन बगैर गुरु के पार नहीं हो सकता है। वेदव्यास के लड़के बचपन में ही साधना करने के लिए चले गए थे। साधना जब करते थे। सुरत-जीवात्मा ऊपर जब उनकी चढ़ती थी तो विष्णु लोक के दरवाजे पर पहुंचते-पहुंचते वहां से उनको वापस कर दिया जाता था कि तुमने गुरु नहीं किया है, अंदर नहीं जा सकते हो। केवल गुरुमुख ही अंदर प्रवेश कर सकते हैं। कबीर साहब ने तो यहां तक कह दिया-

निगुरा मुझको न मिले पापी मिले हजार।
एक निगुरा के सिर पर पर लख पापीयों का भार।।

लाख पापियों का बोझा, निगुरा के सर पर होता है। जो नामदान दीक्षा नहीं लेता, गुरु नहीं करता, उसके सिर पर लाख पापियों का बोझा होता है आपको यह नहीं पता है कि पिछले जन्म में आप कहां थे। कुछ तो अच्छा कर्म किया कि जिसकी वजह से मनुष्य शरीर आपको मिला। लेकिन जो बुरे कर्म भी बने वह अभी खत्म नहीं हुए। कुछ पाप कर्म बन गया, बुरा कर्म बन गया, वह आपको अंदर में आगे बढ़ने नहीं देता है, तरक्की नहीं होने देता है।

जब सच्चे गुरु मिलते हैं तो कर्मो को काटने का तरीका बता देते है

कर्मों का जब से विधान बना, जीव फंस गया। जब गुरु मिलते हैं, सतगुरु मिलते हैं, कर्मों को काटने का तरीका बता देते हैं। अपनी दया से कर्मों को काट देते हैं, कटवा देते हैं। तब जीव निर्मल हो जाता है। जो जान-अनजान में कर्म बन गया, अच्छा या बुरा, अंत:करण में जमा है, उससे यह जीवात्मा कर्मों से ढक गई। अब आगे नहीं बढ़ पा रही है। समझो की गांठ की बन गई। वह गांठ जब तक खुलेगी नहीं तब तक घट उजियारा होगा नहीं। अंधेरे में ही रहोगे। अंधेरे में ही पैदा हुए, अंधेरे में, भूल-भ्रम में ही यह जिंदगी निकल जाएगी।
गुरु माने यही होता है-

रूह है नाम प्रकाश का, गुरु कहिए अंधकार।
ताकौ करे विनाश जो सोई गुरु करतार।।

अपनी आंखों को बंद किया तो अंधेरा हो गया। लेकिन इन बाहरी आंखों को बंद करने पर अंतर में उजाला हो जाए, जो उजाला पैदा कर दे, करा दे वही सतगुरु हुआ करता है। कहा गया है-
सतगुरु खोज रे प्यारे, जगत में दुर्लभ रतन यही।
सतगुरु की खोज करनी चाहिए। जब मिल जाए तब उनके पास जाना चाहिए और उनसे सीख लेनी चाहिए। उनके बताए रास्ते पर चलना चाहिए। मन मुखता छोड़ना चाहिए, गुरु मुखता धारण करना चाहिए।

जब-जब संत जगत में आवै, धूल भाल उनके धिख जाओ।
जाया करो दर्शन और सेवा, पड़े रहो सदा चरणन में।।

हमेशा वो परमात्मा मनुष्य शरीर में सन्त रुप में धरती पर हमेशा मौजूद रहते हैं। जब धरती पर पाप कम रहता है तो एक जगह बैठकर जीवों की संभाल करते रहते है। जब पाप-अत्याचार ज्यादा बढ़ जाता हैं तो जगह -जगह घूमकर-घूमकर लोगों की संभाल रक्षा करते हैं।

घिरी बदरिया पाप की, बरस रहे अंगार।
सन्त न होते जग में तो जल मरता संसार।।