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प्रेस विज्ञप्ति

तिलक और आजाद की जयन्ती पर संगोष्ठी के साथ वृहद वृक्षारोपण अभियान

बरूआसागर(झांसी)। आज क्रांतिवार सेवक संघ के तत्वावधान में ” आजाद और तिलक की स्वतन्त्रता की गौरव गान के मूल्य” विषय पर पं बंगाल के पूर्व मुख्य सचिव डाॅ प्रमोद अग्रवाल की अध्यक्षता और सेन्ट्रल यूनीवर्सिटीज के पूर्व सीनेटर डाॅ सुनील तिवारी मुख्य वक्ता रहे। संगोष्ठी के संयोजक क्रांतिवीर सेवक संघ के नगर संयोजक पं दिनेश मिश्रा रहे ।

अपने अध्यक्षीय उद्बबोधन में डाॅ प्रमोद अग्रवाल ने कहा कि सीताराम तिवारी और जगरानी देवी के घर 23 जुलाई 1906 को एक बच्चा पैदा हुआ. उसका नाम रखा गया चंद्रशेखर. मध्य प्रदेश के भाबरा में पैदा हुए चंद्रशेखर का नाम आज़ाद कैसे पड़ा उसके पीछे कहानी है. आजाद की माताजी उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहती थी. पर आज़ाद का प्लान तो देश को अंग्रेजों से आज़ाद कराने का था।

जलियांवाला बाग कांड के बाद सारे बड़े क्रांतिकारी प्रोटेस्ट पर उतर आए थे. चंद्रशेखर ऐसे ही किसी प्रोटेस्ट का हिस्सा बने थे. जिसमें अंग्रेजों ने उन्हें अरेस्ट कर लिया. उस वक्त वो केवल 16 साल के थे. धरे गए थे तो कोर्ट में पेशी हुई. मजिस्ट्रेट ने जब नाम, पता, औऱ बाप का नाम पूछा तो चंद्रशेखर ने जवाब में कहा कि, मेरा नाम आज़ाद है, पिता का नाम स्वतंत्र और पता जेल है. चंद्रशेखर के इस जवाब को सुनकर मजिस्ट्रेट चौंक गया. उसने चंद्रशेखर को 15 दिनों तक जेल में रहने की सजा सुनाई. जेल में उन्हें अंग्रेजों ने बहुत पीटा. हर मार के बाद वो और सख्त होते गए. जेल से बाहर निकलते ही लोगों ने आज़ाद का स्वागत फूल और मालाओं से किया. अखबार में फोटो उनकी फोटो छपी वो भी जबरजस्त कैप्शन के साथ। इसके बाद से लोग उन्हें आज़ाद के नाम से जानने लगे।

मुख्य वक्ता डाॅ सुनील तिवारी ने कहा किआजाद काकोरी कांड में शामिल थे. उनके अंडर में 10 क्रांतिकारियों ने काकोरी में ट्रेन लूटी जिसमें फिरंगियों का पैसा जा रहा था. सारे पैसे अंग्रेज सिपाहियों के कंधे पर गन तानकर लोहे के उस बक्से से निकाल लिया. और वहां से निकल लिए. जो पैसे आज़ाद और उनके साथियों ने लूटे थे वो बहुत थे. और अंग्रेजी हुकूमत के थे. तो जाहिर सी बात है उसके लिए अंग्रेज खून देने और लेने दोनों पर उतारू हो गए थे. जिन लोगों ने ट्रेन को लूटा था उनको गोरे सिपाहियों ने खोज-खोज कर मारना शुरू किया. 5 उनकी पकड़ में आ गए. गोरों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया. आजाद भेस बदलने में माहिर थे. वो एक बार फिर से अंग्रेजों से बच निकले. नंगे पैर विंध्याचल के जंगलों और पहाड़ों के रास्ते चलकर वो जा पहुंचे कानपुर. जहां उन्होंने एक नई क्रांति की शुरुआत की. इस काम में भगत सिंह भी शामिल थे।
काकोरी कांड के बाद अंग्रेजी पुलिस उनके पीछे पड़ गई थी. वे सांडर्स की हत्या, काकोरी कांड और असेंबली बम धमाके के बाद फरार होकर झांसी आ गए थे. उन्होंने अपनी जिंदगी के 10 साल फरार रहते हुए बिताए. जिसमें ज्यादातर समय झांसी और आसपास के जिलों में ही बीता. इसी बीच उनकी मुलाकात मास्टर रुद्रनारायण सक्सेना से हुई. वे स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे. दोनों के बीच में दोस्ती का बीज डालने के लिए ये वजह काफी थी. चंद्रशेखर आजाद कई सालों तक उनके घर पर रहे. अंग्रेजों से बचने के लिए वे अक्सर एक कमरे के नीचे बनी गुप्त जगह (इसे तालघर कहा जाता था, अब ये बंद कर दिया गया है) में छिप जाते थे।और फिर नयी योजनाओं के साथ आजाद नया आगाज करते थे।
संयोजक दिनेश मिश्रा ने कहा कि
बाल गंगाधर तिलक का जन्म महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश (रत्नागिरि) के चिक्कन गांव में 23 जुलाई 1856 को हुआ था।
अपने परिश्रम के बल पर शाला के मेधावी छात्रों में बाल गंगाधर तिलक की गिनती होती थी। वे पढ़ने के साथ-साथ प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम भी करते थे, अतः उनका शरीर स्वस्थ और पुष्ट था।
सन्‌ 1879 में उन्होंने बी.ए. तथा कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की।
परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने अपनी सेवाएं पूर्ण रूप से एक शिक्षण संस्था के निर्माण को दे दीं। सन्‌ 1880 में न्यू इंग्लिश स्कूल और कुछ साल बाद फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना की।
तिलक का यह कथन कि ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा’ बहुत प्रसिद्ध हुआ। लोग उन्हें आदर से ‘लोकमान्य’ नाम से पुकार कर सम्मानित करते थे।
लोकमान्य तिलक ने जनजागृति का कार्यक्रम पूरा करने के लिए महाराष्ट्र में गणेश उत्सव तथा शिवाजी उत्सव सप्ताह भर मनाना प्रारंभ किया। इन त्योहारों के माध्यम से जनता में देशप्रेम और अंगरेजों के अन्यायों के विरुद्ध संघर्ष का साहस भरा गया।

तिलक के क्रांतिकारी कदमों से अंगरेज बौखला गए और उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाकर छ: साल के लिए ‘देश निकाला’ का दंड दिया और वर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया।

इस अवधि में तिलक ने गीता का अध्ययन किया और गीता रहस्य नामक भाष्य भी लिखा।
तिलक ने मराठी में ‘मराठा दर्पण व केसरी’ नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किए जो जनता में काफी लोकप्रिय रहे।
आज के कार्यक्रम में राजेंद्र श्रीवास, शिवा कश्यप, बृजेश अग्रवाल (कडोरी), मनोज यादव (माते), लक्ष्मी प्रसाद झा (मुन्ना नेता), प्रमोद राय, धीरेंद्र चतुर्वेदी (भोले), आनंद बिरथरे, बृजेन्द्र नायक आदि प्रमुख रूप से शामिल रहे। कार्यक्रम का संचालन जयप्रकाश विरथरे ने किया।