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जय गुरु देव

09.08.2021
प्रेस नोट
इंदौर, म.प्र.

शरीर छोड़ते वक़्त सतगुरु अपने जीवों की डोर को उस समय के सन्त को पकड़ा देते हैं, इसलिए समय के गुरु ही सब कुछ होते हैं

परम सन्त बाबा जयगुरुदेव जी महाराज के द्वितीय मासिक भंडारे के अवसर पर दिल्ली से पधारे श्री सियाराम जी ने बाबा उमाकान्त जी महाराज आश्रम, इंदौर में सतसंग में संतो की महिमा के बारे में बताया कि सन्त इतना जीवों पर उपकार करते हैं की उसका बदला ही नहीं चुकाया जा सकता। एक प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि गुरु नानक जी एक बार सत्संग सुना रहे थे तो सतसंग में एक बच्चा आ गया। बच्चे को सतसंग में ही अनुभव हुआ कि गुरु ही परमात्मा है, गुरु ही भगवान है तो जब नानक जी नामदान देने लगे तो बच्चे को बोला कि अभी तुम बच्चे हो, अभी नामदान तुमको नहीं मिलेगा। तो उसने बोला की कभी भी हमारा समय पूरा हो सकता है और हमारी मृत्यु हो गयी तो हमारी जीवात्मा नर्कों में चली जायेगी। तो गुरु नानक जी ने बोले कि है तो तू बच्चा लेकिन बात बुड्ढों जैसी करता है। जा तेरा नाम आज से बुढ्ढा बाबा है। उसने सत्संग में सुना था कि गुरु के पास आते हैं तो कुछ लेकर आते हैं, ऐसे खाली नहीं जाते गुरु का दर्शन करने। तो बोला मेरे पास तो पैसा है नहीं तो अपने घर से दूध ही ले आया। बोला गुरु जी हमारा दूध पी लो। मौज में बोल दिया गुरु नानक जी ने कि हम तेरा दूध छठे जन्म में पियेंगे।

केले के पात में पात पात में पात।
संतों की बात में बात-बात में बात।।

फिर गुरुओं में नानक देव जी, अंगद देव जी, गुरु रामदास जी, अमर दास जी, अर्जुन देव जी आये। इनके बाद गुरु हरकिशन जी, बूढ़ा बाबा के पास गए और बोलो दूध नहीं पिलाओगे। तब उसको याद आया कि कि जब मैं 15 साल का था तब नानक जी ने मुझसे वादा किया था।

उन्होंने बताया कि अभी तो दूसरा जन्म बाबा उमाकान्त जी महाराज है और हम दूसरे जन्म में ही डगमग होने लगे। कोई कहते हैं वो (महाराज जी) तो गुरु भाई हैं। अभी से हमारी आस्था खराब हो गई। कोई कहां जा रहा है कोई कहां। भजन-सुमिरन-ध्यान करो, आदेश का पालन करो। जो कहा जाय करोगे तो आपका काम हो जाएगा लेकिन विश्वास नहीं हो रहा। संतों का संग इसका नाम है सत्संग। जब संतों के पास में जाओगे वह आपको रास्ता बता देते हैं। कह देते हैं ध्यान-भजन-सेवा करो, प्रचार करो, नाम ध्वनि करो। यह गुरु का हुकुम, आदेश देते हैं। जब आपको रास्ता बता देते हैं तो सबको आदेश का पालन करना चाहिए। इसीलिए गुरु नाम का भेद, नाम का रास्ता देते हैं। गुरु ही नामी है। इन्हीं के मुंह से नाम निकलता है, यही सब है, यही परमात्मा है, यही सत्पुरुष है, यही सन्त है, यही सब कुछ है। कोई शब्द अलग नहीं है, कोई नाम अलग नहीं है, जो कुछ है यही हैं। जो स्थान का वर्णन करते हैं, हर स्थान पर यही बाबा उमाकान्त जी महाराज आपको मिलेंगे। विश्वास न हो तो दो-चार दिन करके देख लो और इनके रूप को याद करके देखो, आप खुद ही कहोगे।

नए व पुराने सभी सत्संगियों की जीवात्माओं की डोर बाबा उमाकान्त जी महाराज जी के हाथ में है

क्योंकि वक्त के गुरु में ही गुरु महाराज है। हमारी जीवात्मा की डोर इन्ही बाबा उमाकान्त जी महाराज के हाथ में देकर चले गए और वक्त के गुरु की पूजा-आराधना-सत्संग करेंगे, उनके आदेश का पालन करेंगे तो ही हमारा काम होगा। पूजा तो हम को केवल नाम की करनी होगी। तो आप लोग कर लोगे तो अच्छा रहेगा, कोई जबरदस्ती नहीं है। पलटू साहब की वाणी में आता है:

संत स्नेही नाम है, नाम स्नेही संत।
नाम सनेही सन्त नाम को वाही मिलावे।।
जप तप तीरथ व्रत करे बहुतेरा कोई।
बिना वसीला संत नाम से भेंट न होई।।

उन्होंने कहा कि मैं तो आपको क्लियर बता रहा हूं, अब खोल करके बता रहा हूं कि वक्त के गुरु के पास नहीं जाओगे, जब तक नाम से मुलाकात नहीं होगी। नाम ही संत को कहते हैं और सन्त ही नाम को कहते हैं। दोनों एक ही है। बिना वसीला संत नाम से भेंट ना होई, कोटिन करो उपाय भटक संगरी से आवे और संत द्वारे जाओ नाम तब घर को पाओ। नाम मिलेगा फिर आपको अपना घर मिल जाएगा। वक्त का सन्त, वक्त का गुरु जो होगा वही आपको रास्ता दे देगा। वक्त के गुरु जो होते वे संत-महात्मा होते हैं। सीधे शब्द में कहा सात पुरी हम देख लिया, देखा चारों धाम। सन्तों की कृपा के सब बेकार।

मालिक का कहना नहीं मानने वाले प्रेमियों पर काल भगवान हंसते हैं

हम सत्संगी अपने को मालिक का बच्चा कहते हैं। और मालिक का कहना जो प्रेमी नहीं मानते तो काल भगवान उन पर हंसते हैं। ऐसा काम क्यो किया जाए कि हमारे पिता पर कोई हँसे? महात्माओं ने एक-एक जीव को पकड़ने के लिए कितनी तकलीफे उठाई, वर्णन नहीं किया जा सकता। एक बार स्वामी जी दर्शन दे रहे थे तो एक बच्चा उनके पैर में बिलेट मार दिया, उनके पैर से खून निकाल रहा था फिर भी उसके सर पर हाथ रखा और आगे दर्शन देते चले गए। बच्चे से पूछा कि तूने बिलेट क्यों मारा? तो बोला कि सुना है महात्मा बहुत दयालु होते हैं, दया ही दया रहती है, मैं देखना चाहता था। और हम सत्संगी उस सतपुरुष अनामी महाप्रभु जी के बच्चे है हम कैसे जरा से में नाराज-क्रोध हो जाते हैं। हमको भी वैसे दया रखनी चाहिए।