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जय गुरु देव

प्रेस नोट
उज्जैन, मध्य प्रदेश
03.08.2021

वृक्षों को लगाओ, नदियों को साफ रखो, भविष्य में इनसे जीवनदान का आधार मिलेगा-बाबा उमाकान्त जी महाराज

मनुष्य को सच्चे धर्म, कर्म और प्रकृति के अनुरूप आचरण करने की शिक्षा देने वाले वर्तमान के पूरे सन्त सतगुरु बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 27 अप्रेल 2021 अपने बाबा उमाकान्त जी महाराज आश्रम उज्जैन से यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम के माध्यम से ऑनलाइन सतसंग में प्रकृति के महत्त्व को समझाते हुए आव्हान किया कि लोग नदियों के जल को स्वच्छ रखें, वृक्षों को न काटें, जंगल को नष्ट न करें बल्कि वृक्ष लगाए क्योंकि आगे चलकर ये नदी, वृक्ष ही सब मनुष्यों के जीवनदान का सहारा बनेगा।

शहर के पानी का कोई भरोसा नहीं। बिजली चली जाए तो देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जायेगी

नदियों को साफ-सुथरा रखो। नदियों के पानी की जरूरत पड़ेगी। आगे चलकर के यही नदियों का पानी जीवनदान देने का सहारा बनेगा। यही नदियों का पानी बहुत से लोगों को पीना पड़ेगा। शहर के पानी का कोई ठिकाना नहीं, मिले न मिले, कब बंद हो जाए। यदि बिजली अभी बंद हो जाए, पूरे देश में समझो सारी व्यवस्था खत्म हो जाए। अभी भागकर के पेड़ों के नीचे जिनको अभी काट दे रहे हो, पेड़ लगाने के बजाय काट दे रहे हो, उसी पेड़ की जरूरत आपको पड़ने लगेगी। एक पेड़, दो पेड़, चार पेड़ लगा दिया। एसी, पंखा नहीं चलेगा तो उसी पेड़ के नीचे बैठकर आराम तो कर लोगे। जंगलों को काटना ठीक नहीं बल्कि वृक्षों को लगाना है।

प्रकृति को हरा-भरा करो, वृक्षों को लगाओ ताकि अगली पीढ़ी के भी काम आए

महाराज जी ने कहा कि इस समय देखो चैत्र के महीने में, वैशाख के महीने में धूप कितनी तेज होती है। अब घर से निकलना ही पड़े, शहर छोड़ना ही पड़े, गांव छोड़ना ही पड़े, घर छोड़ना ही पड़े, परिस्थिति ही ऐसी आ जाए तो पेड़ के नीचे कुछ छाया तो मिल जाए, थोड़ा आराम तो मिल जाए। इसलिए प्रेमियों! आपको छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान देने की जरूरत है।

आपसी लड़ाई, झगड़ा, शंका, मनमुटाव होता है तो फिर सुलझ भी सकता है

महाराज जी ने बताया कि एक देश के राजा और दूसरे देश के राजा के बीच, देखो किसी भी बात का मनमुटाव हो जाता है तो लड़ाई की संभावना बन जाती है। उस लड़ाई की संभावना में लड़ाई हो जाती है, जनधन की हानि होती है लेकिन मनमुटाव पैदा हो जाता है तो दूर भी हो जाता है। शंका हो जाती है तो शंका दूर भी हो जाती है। और जमीन जायदाद की कोई बात होती है, बंटवारे कि वह भी समस्या सुलझ जाती है तो लड़ाई टल जाती है।

ये जरूरी नहीं कि आपके कर्मों से प्रकृति समझौता करले

लेकिन कुदरत की जो लड़ाई होती है, प्रकृति की मार होती है, वह जो सजा होती है उससे लोग जल्दी बच नहीं पाते हैं। कोई जरूरी नहीं है कि आप जो कर्म कर रहे हो, उनसे प्रकृति समझौता ही कर ले। इसलिए बड़े ही होशियारी से रहने की जरूरत है। प्रकृति के नियम को तोड़ना नहीं है, प्रकृति को छेड़ना नहीं है।

प्रकृति के नियम को तोड़ो मत, प्रकृति से छेड़छाड़ मत करो

महाराज जी ने बताया कि जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश से इस शरीर की रचना हुई है तो शरीर को इन सबकी जरूरत है। धरती की शुद्धता जरूरी है। गंदी जगह पर आप पैर नहीं रखते हो, बैठते, उठते, लेटते नहीं हो। ऐसे ही गंदगी जब रहेगी इस धरती के ऊपर, उसकी हवा जब आपको लगेगी तो बीमारी बढ़ेगी। इसलिए इसको साफ सुथरा रखो।

हाथ जोड़कर विनय हमारी।
हो जाओ सब शाकाहारी।।

धरती पर जब ज्यादा खून बहता है, इस धरती के जमीन के ऊपर जब मांस जानवरों का कटता हैं, जानवरों कि हिंसा हत्या जब ज्यादा होती है, जब मनुष्य की मृत्यु ज्यादा होती है तो धरती भी गंदी हो जाती है और उससे हवा भी उससे। मान लो जैसे कोई मुर्दा पड़ा है, उठाने वाले नहीं हैं। उसको छोड़ कर के चले गए। कुत्ते खाएंगे, जानवर खाएंगे। जैसा कि इस समय पर कई जगह पर हो रहा है तो उससे टकराकर के जो हवा आएगी, नाक में लगेगी तो वह क्या शुद्ध हवा होगी? वह तो बीमारी पैदा ही करेगी।

शाकाहारी होने से, जानवरों को न काटने से पर्यावरण दूषित नहीं होगा।

इसलिए इस वायुमंडल को शुद्ध रखना जरूरी है। बराबर हाथ जोड़कर के प्रार्थना लोगों से करता रहा, आज भी कर रहा हूं कि भाई शाकाहारी हो जाओ। सब लोग शाकाहारी जब हो जाओगे, जानवरों को नहीं मारोगे, जानवर को नहीं काटोगे खाने के लिए, जब लोग नहीं काटेंगे तो उनका खून धरती पर नहीं गिरेगा, मांस नहीं पड़ेगा, खालें और हड्डियां यह सब जमीन पर नहीं पड़ेगी तो हवा शुद्ध रहेगी, धरती शुद्ध रहेगी। इससे जो जल है वह भी दूषित नहीं होगा। उसमें भी इस तरह की गंदी चीजें बहकर नहीं जाएंगी।

जानवरों के कत्लखानों से बहता खून नदी और पर्यावरण को बहुत अशुद्ध करता है।

आपको बहुत से लोगों को नहीं मालूम है कि जहां जानवर काटे जाते हैं वहां खून बहता है और वह खून कहां जाता है? नाले से होकर के नदियों में जाता है। तो जल दूषित हो जाता है, खराब हो जाता है। वह तत्व उसने नहीं रह जाते हैं।
उदगम के स्थान पर जल में, नदियों में तत्व रहते हैं। इसलिए प्रेमियों! इस समय इन बातों पर विशेष ध्यान रखने की जरूरत है।