बहुजन समाज को उधमसिंह जैसे क्रांतिकारियों जरूरत

बहुजनों को राजपाठ बैलेट-बुलेट दोनों से ही संभव है

जनहित में प्रकाशनार्थ

प्रायागराज 31.07.2020, बसपा संस्थापक बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम ने एक सभा को संबोधित करते हुये कहा था कि अगर बहुजन समाज ये सोचकर चलेगा कि देश मे बहुजनों का राजपाठ बैलेट से आ जायेगा तो बहुजन समाज अपने आपको धोखे में रख रहा है। बहुजन समाज को राजपाठ तो बैलेट से लेना ही है लेकिन तैयारी बुलेट की भी रखनी है। बहुजन समाज को यह नहीं सोचना है कि हमे बैलेट से लगाव है और बैलेट के आधार पर ही इस देश मे परिवर्तन लाना है। अगर मुट्ठीभर लोग बुलेट का इस्तेमाल करे, लाठी डंडे का इस्तेमाल करे या गैर संबैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करे तो उसका मुहतोड़ जबाब देने के लिये हमे भी अपनी शक्ति का इस्तेमाल करना पड़ेगा। उक्त बातें “बहनजी को जगाओ अभियान” के राष्ट्रीय संयोजक पूर्वांचल दलित अधिकार मंच (पदम) के संस्थापक उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आईपी रामबृज ने अमर शहीद वीर उधम सिंह (निर्वाण 31 जुलाई 1940) की 80 वें शहादत दिवस पर आयोजित आनलाइन परिचर्चा में कही।
राष्ट्रीय संयोजक ने आगे बताया कि ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधम सिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधम सिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।

राष्ट्रीय संयोजक ने आगे बताया कि ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधम सिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधम सिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।

प्रायागराज मण्डल के मण्डल संयोजक आशीष कुमार गौतम ने बताया कि अनाथालय में उधमसिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। वह पूरी तरह अनाथ हो गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधमसिंह अनाथ हो गए थे लेकिन इसके बावजूद भी वह विचलित नहीं हुये और देश की आजादी तथा डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे।
उधमसिंह 13 अप्रैल 1919 को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या अभी भी सामने नहीं आ पाई है। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गये थे और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ली।

बस्ती मण्डल के मण्डल संयोजक अक्षय कुमार ने बताया कि अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुँचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कामर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा। उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गये। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।

वाराणसी मण्डल के मण्डल संयोजक अरविन्द भूषण ने बताया कि बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। 4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी।

इस ऑनलाइन परिचर्चा में रिटा. डिप्टी एसपी राजपाल सिंह, यशवन्त कुमार सिंह, वीरेन्द्र भारती, राजकिशोर राही, अभिषेक अम्बेडकर, एड.जगमोहन, डा. अजय कुमार, संतोष कुमार बौद्ध, संजीत कुमार, अजय सिंह, बीएल गौतम आदि उपस्थित रहे।

हिमांशु जैसवार
प्रभारी मीडिया
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