मै एक ग्रामीण महिला हूँ। मुझमे अपने गांव की मिट्टी रस  रस मे बसी है

मै एक ग्रामीण महिला हूँ। मुझमे अपने गांव की मिट्टी रस रस मे बसी है

बचपन से आज तक गांव की मिट्टी ने एक ही चीज सिखायी अपना पन अपनों पर भरोसाअपनी धरती अपने अम्बर पर पूरा बिस्वास आज कही न कही गाँव से दूर सपनो को पूरा करने के लियेपरदेश जाकर कमाने के लिए गांव क्यों भाग रहे हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि गांव भूखा नहीं मरने देगा। गांव में बेकारी है लेकिन भुखमरी नहीं है। लाख विपन्नताओं के बाद भी गांव में भूख से शायद ही कोषई मरता हो।

शहर आवश्यकता नहीं सपने पूरा करता है।

आवश्यकता के लिए अपनी मिट्टी में ही आना होता हैं। जड़े जड़े होती हैं …आज उन्हें सपने नही आवश्यकता पूर्ण करनी हैं। वह भी तब जब कोई सरकारी सहायता नहीं आ रही। कोई एनजीओ राशन बांटने नहीं आ रहा। गांव अपने बलबूते पर जिन्दा है। लेकिन शहर ज्यादा दिन अपने बूते जिन्दा नहीं रह सकते। क्योंकि न तो वो अनाज पैदा करते हैं, न पानी पैदा करते हैं। वो जो पैदा करते हैं उसे खा नहीं सकते। इसीलिए सभ्यता की इक्कीसवीं सदी में भी गांव शहरों से श्रेष्ठ हैं। एक सभ्यता के लिए गांव होना जरूरी हैं ।हमारे देश का गौरव है गाँव, गाँव है तो हम सब की जान हैं, गाँव से ही मेरी आप की पहचान है हम सब का दायित्व बनता है अपने गाँव को बनाने

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