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जयगुरुदेव
प्रेस नोट
18.09.2021,
इंदौर, मध्य प्रदेश

कुदरती थप्पड़ लगते समय जब एकमात्र मददगार सन्त सतगुरु भी थोड़ी देर के लिए आंख बंद कर लेंगे तब कौन बचाएगा?

कुदरत के कहर से बचने के उपाय बताने वाले वर्तमान के पूरे सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 4 जुलाई 2021 को अपने बाबा उमाकान्त महाराज आश्रम, इंदौर से भक्तों को संदेश दिया कि आप किसी-किसी के कर्म बहुत गंदे हो जाते हैं। और आदमी यही सोच लेता है कि हमारे समरथ गुरु मदद करेंगे लेकिन आपके कर्मों को गुरु कितना भोगेंगे? कर्मो का चक्कर आपको नहीं मालूम है। कर्मों का लेना-देना होता है। आपके कर्मों को गुरु अपने ऊपर तो लेकर भोग लेंगे और आपको आराम तो मिल जाएगा लेकिन जब गुरु भोगते-भोगते थक जाएंगे तब मुख मोड़ लेंगे फिर आपको ज्यादा परेशानी होगी। इसलिए गुरु से, प्रभु से प्रेम बनाए रखने के लिए उनसे कुछ लेने के लिए आदेश का पालन करो। बाप होता है तो बेटा बाप को भी खुश रखता है और बाप तो बेटे का पालन-पोषण करता ही है, बच्चे की इच्छाओं को पूरा करता ही है। लेकिन पिता के आदेश का पालन अगर बेटा न करें, उल्टा करे तो पिता मदद करेगा? कुछ नहीं करेगा, मुख मोड़ लेगा। जब पिता मुख मोड़ लेता है तब आदमी न कुछ सीख पाता है न कुछ कर पाता है। अपने ही किए हुए कर्मों के अनुसार सजा पा जाता है।

प्रेमियों! नभ्या और जिभ्या के स्वाद से मन को हटाओ और भजन में लगाओ तो मन हार जाएगा

प्रेमियों! आपके कर्म आंख बंद होने नहीं देते हैं। यही इधर-उधर खाने-पीने में जीभ को चटोरा बना दिया। नभ्या-जिभ्या के स्वाद में मन चंचल हो गया तो कहां से भजन करने देगा? सबसे पहले इस पर कंट्रोल करो। नभ्या-जिभ्या की तरफ से मन को हटाओ, मनाओ, मन को मारो। मन कहे उस समय उससे कहो कि हम इस वक्त पर तुम्हारा कहना नहीं मानेंगे।

प्रेमियों! आपको पत्थर बने नहीं रहना है

प्रेमियों! साधना पर आप बैठो तो मन आपसे कहेगा चलो उठ जाओ, खाओ क्योंकि खाने में ही मन लगा हुआ है। चाट-चौपाटी बढ़िया बनाओ-खाओ। मन उधर घूमने में, टहलने में, सुंदर-सुंदर चीजों को देखने में ही लगा हुआ है। तो मन तो आपको उठा देगा, बैठने नहीं देगा। जब आप उठ जाओगे तो हार जाओगे और मन आपका जीत जाएगा और मन जब जीत जाएगा तब आप हमेशा हारे रहोगे। इसलिए कम से कम 2 घंटा जो कहा गया बैठने की आदत तो डालो। अरे भाई सप्ताहिक सत्संग में आते हो तो किस लिए आते हो? आपको सोचना चाहिए। कुछ सुनने को मिलता है, कुछ समझने को मिलता है। आपको कोई बताने वाला, समझाने वाला नहीं है। तो आंख बंद करके आप ध्यान तो लगाओ, भजन तो करो। आप समझो नामदान आप बहुत लिए हुए रहोगे बहुत अपने को सत्संगी कहोगे तो उससे कुछ नहीं होगा। बस इसी तरह से होगा जैसे एक पत्थर पानी में पड़ा हुआ है और एक पत्थर धूप में पडा हुआ है लेकिन है तो पत्थर ही। तो आप इस बात को समझो आपको पत्थर बने नहीं रहना है।

प्रेमियों! भजन में तरक्की न दिखाई दे तो आप करो सेवा

प्रेमियों! बराबर आदत डालो। अगर बैठने में भी भजन में तरक्की न हो तो कर्म जिससे इकट्ठा हुए हैं उसको काटने के लिए सेवा करो। कर्म किससे इक्क्ठा होते हैं तन-मन-धन से। सेवा करो। आप सत्संग जब सुनते रहोगे तब आपको जानकारी रहेगी कि किस तरह से बुरे कर्मों से बचा जाए। बराबर बताया जाता है कि किस तरह तन से और किस तरह से मन की सेवा की जाए और तन और मन के कर्मों से बचा जाए।

प्रेमियों! मन को गुरु के मिशन को आगे बढ़ाने में लगाओ

देखो मन भी पापी हो जाता है, कामी क्रोधी लोभी लालची हो जाता है तो वह शरीर से वही काम कराता है। तो आप मन को किधर लगाओ? गुरु महाराज जो मिशन छोड़ कर के गए उसको आगे बढ़ाने में लगाओ। गुरु महाराज जो लोगों को शाकाहारी सदाचारी नशा मुक्त बनाने में और जो सबसे सरल साधन बता करके गए, उनको आप करो। ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है कि चौपाई दोहा श्लोक सुनाओ तब आपकी बात किसी के समझ में आवे। आप जहां रहते हो अपने ही एरिया-क्षेत्र में अपने ही तौर-तरीके से अपने ही जाति-बिरादरी-समाज में लोगों को समझा सकते हो। शाकाहारी नशामुक्त हो जाएं, बुरे कर्मों से बच जाएं। गुरु महाराज जो मिशन छोड़ कर के गए मन को इसमें लगाओ। मन जब उसमें लगेगा तब तक तो उधर नहीं जाएगा।

तन मन धन कि जो सेवा आपको बताई गई, अपनी औकात भर, शक्ति भर उसको करो

धन के लिए ध्यान रखो कि गलत जगह पर न चला जाए, इसका कोई गलत उपयोग न करे। इसलिए कहा गया कि धन को अच्छे कामों में लगाना चाहिए। सेवा करनी चाहिए। तो बराबर तन-मन-धन की जो सेवा बताई गई अपने औकात भर, अपने शक्ति भर जो कर सकते हो उसको करो।