You are currently viewing महिला अधिकारों के साथ-साथ नारी सशक्तिकरण की जरूरत : जस्टिस एम.एम. कुमार

महिला अधिकारों के साथ-साथ नारी सशक्तिकरण की जरूरत : जस्टिस एम.एम. कुमार
नई दिल्ली।जस्टिस व नेशनल हुमन राइट्स कमिशन के मैम्बर एम.एम. कुमार ने
ला जॉइंट द्वारा ऑर्गेनाइज्ड वेबीनार का उद्घाटन करते हुए बताया कि आज महिलाओं को अधिकारों के साथ साथ सशक्तिकरण की भी जरूरत है।उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकार वो अधिकार हैं जो प्रत्येक महिला या बालिका का विश्वव्यापी समाजों में पहचाना हुआ जन्मसिद्ध अधिकार या हक है। १९वीं सदी में महिला हक संग्राम और २०वीं सदी में फेमिनिस्ट आंदोलन का यह आधार रहा है।कई देशों में यह हक कानूनी तौर पर,अंदरूनी समाज द्वारा या लोगों के व्यवहार में लागू होता है तो कई देशों में यह प्रचलित नहीं है।कई देशों में व्यापक तौर पर मानवाधिकार का दावा निहित इतिहासिक और परम्परागत झुकाव के नाम पर महिलाओं और बालिकाओ का हक पुरुषों और बालकों के पक्ष में दे दिया जाता है।महिलाओं के अधिकार के विषय मे कुछ हक अखंडता और स्वायत्तता शारीरिक करने की आजादी, यौन हिंसा से मुक्ति; मत देने की आजादी; सार्वजनिक पद धारण करने की आजादी; कानूनी कारोबार में प्रवेश करने की आजादी;पारिवारिक कानून में बराबर हक; काम करने की आजादी और समान वेतन की प्राप्ति; प्रजनन अधिकारों की स्वतंत्रता; शिक्षा प्राप्ति का अधिकार है। जस्टिस एम.एम. कुमार ने कहा कि मैं भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एन वी रमन्ना के दिए गए सुझावों से सहमत हूं कि महिलाओं को 50 परसेंट आरक्षण मिलना चाहिए।यह हमारे लिए बहुत जरूरी है।यदि ऐसा होता है तो इससे सभी महिलाएं सशक्तिकरण की तरफ बढ़ेंगी।
इसके बाद वेबीनार की स्पीकर नेहा मिश्रा ने बताया कि महिलाओं के क्या अधिकार हैं और उनको क्या करना चाहिए।
लैंगिक असमानता,मानव इतिहास में अन्‍याय का एक सबसे निरन्‍तर और व्‍यापक रूप है इसलिए इसे मिटाने के लिए बदलाव की दिशा में एक सबसे बड़े आंदोलन की आवश्‍यकता होगी।दुनिया के हर हिस्‍से में महिलाएं और लड़कियां आज भी भेदभाव और हिंसा झेल रही हैं।हर क्षेत्र में लैंगिक समानता के मामले में कमियां मौजूद हैं। दक्षिण एशिया में 1990 में प्राइमरी स्‍कूलों में हर 100 लड़कों पर सिर्फ 74 लड़कियां भर्ती होती थीं लेकिन 2012 तक भी भर्ती का अनुपात वही था।155 देशों में कम से कम एक कानून ऐसा मौजूद है जो कि महिलाओं के लिए आर्थिक अवसरों में बाधक है। अधिकांश देशों में महिलाएं,पुरुषों को मिलने वाले वेतन की तुलना में औसतन सिर्फ 60% से 75% तक ही कमा पाती हैं।सभी देशों की संसदों में केवल 22.8 प्रतिशत महिला सांसद हैं।हर तीन में से एक महिला अपने जीवन काल में किसी न किसी प्रकार की शारीरिक अथवा यौन हिंसा की शिकार होती है।
लैंगिक समानता न सिर्फ एक बुनियादी मानव अधिकार है बल्कि एक शांतिपूर्ण और टिकाऊ विश्‍व के लिए आवश्‍यक बुनियाद भी है। महिलाओं को मुख्‍यधारा से बाहर रखने का मतलब दुनिया की आधी आबादी को संपन्‍न समाज और अर्थव्‍यवस्‍थाओं के निर्माण में भागीदारी के अवसर से वंचित रखना है।शिक्षा की समान सुलभता,लाभकारी काम और राजनीतिक तथा आर्थिक निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी न सिर्फ महिलाओं के लिए आवश्‍यक अधिकार हैं बल्कि इनसे कुल मिलाकर मानवता लाभान्वित होती है। महिलाओं के सशक्तिकरण में निवेश कर हम न सिर्फ सतत् विकास लक्ष्‍य की दिशा में आगे बढ़ते हैं,बल्कि गरीबी कम करने में भी लाभ होता है तथा टिकाऊ आर्थिक वृद्धि को गति मिलती है।

  • सभी महिलाओं और लड़कियों के साथ हर जगह हर प्रकार का भेदभाव मिटाना।
  • सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में सभी महिलाओं और लड़कियों के प्रति सभी प्रकार की हिंसा समाप्‍त करना जिसमें तस्‍करी और यौन व अन्‍य प्रकार के शोषण को समाप्‍त करना शामिल है।
  • बाल विवाह, कम उम्र में और जबरन विवाह तथा महिला जननांग भंग करने जैसी सभी हानिकारक प्रथाओं का उन्‍मूलन करना।
  • जन सेवाओं, बुनियादी सुविधाओं और सामाजिक संरक्षण नीतियों के माध्‍यम से नि:शुल्‍क सेवा और घरेलू काम को मान्‍यता और महत्‍व देना तथा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर उपयुक्‍तता के आधार पर घर और परिवार के भीतर साझी जिम्‍मेदारी को प्रोत्‍साहित करना।
  • राजनीतिक, आर्थिक और सार्वजनिक जीवन में निर्णय प्रक्रिया के सभी स्‍तरों पर महिलाओं की पूर्ण और कारगर भागीदारी तथा नेतृत्‍व के समान अवसर सुनिश्चित करना।
  • अंतर्राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या और विकास सम्‍मेलन के कार्रवाई कार्यक्रम और बीजिंग प्‍लेटफार्म फॉर एक्‍शन तथा उनके समीक्षा सम्‍मेलनों के निष्‍कर्ष दस्‍तावेजों के अनुरूप हुई सहमति के अनुसार यौन तथा प्रजनन स्‍वास्‍थ्‍य एवं प्रजनन अधिकारों की सबके लिए सुलभता सुनिश्चित करना।
  • महिलाओं को आर्थिक संसाधनों पर समान अधिकार तथा जमीन और अन्‍य प्रकार की संपत्ति, वित्‍तीय सेवाओं, उत्‍तराधिकार और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और स्‍वामित्‍व को राष्‍ट्रीय कानूनों के अनुसार सुलभ कराने के लिए सुधारों को अपनाना।
  • महिला सशक्तिकरण को प्रोत्‍साहित करने के लिए विशेषकर सूचना और संचार टैक्‍नॉलॉजी सहित सामर्थ्‍यकारी टैक्‍नॉलॉजी का इस्‍तेमाल बढ़ाना।
  • सभी स्‍तरों पर, सभी महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण और लैंगिक समानता के संवर्द्धन हेतु ठोस नीतियां एवं लागू करने योग्‍य कानून अपनाना और उन्‍हें मजबूत करना।
    इसके बाद रोहित जी ने बताया कि दिल्ली सरकार और भारत सरकार काफी उत्कृष्ट कदम उठा रही है।महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए दिल्ली सरकार पूरी तरह से महिलाओं के साथ है और महिलाओं के लिए भी काम कर रही है और उनकी भागीदारी भी सरकार में सुनिश्चित कर रही है।अंत में ला जॉइंट के फाउंडर राजिंदर पाल सिंह ने अतिथियों का धन्यवाद किया और समय देने के लिए भी आभार प्रकट किया।साथ ही उन्होंने लेटेस्ट ला डॉट कॉम और katcheri.com का भी धन्यवाद किया।उन्होंने कहा कि हम आगे भी ऐसे वेबीनार करते रहेंगे।