दुनिया के सारे मत जहां से खत्म, वहां से सन्तमत की शुरुआत -बाबा उमाकान्त जी महाराज

छिंदवाड़ा, (म.प्र)

दुनिया के सारे मत जहां से खत्म, वहां से सन्तमत की शुरुआत -बाबा उमाकान्त जी महाराज

यह है सन्तमत। यह सबसे आलामत है। जहां सारे मत खत्म होते हैं वहां संतों का मत शुरू होता है।जहां दुनिया की सारी विद्या खत्म होती है वहां से आध्यात्मिक विद्या की शुरुआत होती है। जहां से दुनिया का सारा धन खत्म होता है। वहां से अध्यात्म धन की शुरुआत होती है। और सन्तो की उसकी जानकारी होती है तो सन्तमत सबसे आला मत होता है।

गुरु की पूजा में सबकी पूजा।
गुरु समान कोई देव न दूजा।।

सन्तमत में गुरु को ही सबसे ज्यादा माना गया है। जितने भी सन्त हुए, जितने भी महापुरुष हुए उन्होंने गुरु को प्रणाम किया, गुरु की ही पूजा की, गुरु के बगैर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाए। राम-मार नहीं सकते थे रावण को।

रावण रथी विरथ रघुवीरा।।
देख विभीषण भए अधीरा।।

जब रावण की फौज निकली तो विभीषण भी दुःखी हो गया, घबरा गया। रावण की फौज के आगे, रावण की वीरता के आगे यह बंदर और भालू क्या टिक पाएंगे? रावण के जो एक-एक राक्षस लड़ने के लिए आ रहे हैं वह एक-एक भैंसा को उठाकर मुंह में डाल लेते हैं, निगल जाते हैं और बन्दर, भालू उनके आगे क्या दिखेंगे।

वरुण कुबेर सुरेस समीरा।
रन सन्मुख धरि काहू न धीरा॥

बड़े-बड़े देवता रावण के आगे नहीं ठहरते थे। राम मार नहीं सकते थे रावण को। परशुराम जी से उन्होंने दो कला मांगा, दीनता के साथ उनसे प्रार्थना किया, कहा दो कला हमको दीजिए। हम धर्म की स्थापना के लिए आए हैं, दुराचारीयों के संहार के लिए। तब उनको मार पाए थे।

परमात्मा को कोई भी प्राप्त कर सकता है। उसके यहाँ जाति-पाति का बंटवारा नहीं

कृष्ण महापुरुष थे। तबके द्वापर के कृष्ण के विद्या गुरु तो संदीपनी थे लेकिन जो आध्यात्मिक गुरु थे, वो सुपच थे। छोटी जाति के थे। कहा गया है प्रभु की प्राप्ति कोई भी कर सकता है। वह आध्यात्मिक शक्ति कोई भी प्राप्त कर सकता है। उसके यहां कोई जाति-पाति का बंटवारा नहीं, मानव होना चाहिए। सबके अंदर इंसानियत होना चाहिए। सबके अंदर रास्ता होता है, प्रभु की प्राप्ति का। तब कृष्ण भगवान ने उनसे कहा कि आप अपनी शक्ति को समेटो। क्योंकि सन्तो की जो शक्ति होती है, परमात्मा से प्राप्त शक्ति होती है। जीवो के लिए रक्षा के लिए वह अपनी शक्ति को फैलाए रहते हैं।

सकल मोर मम उपजाया।।
सब पर मोर बराबर दाया।।

*वक्त के जो सन्त होते हैं, जीवों के रक्षा के लिये वे अपनी शक्ति को फैलाए रहते हैं *

जितने भी जीव हैं सब प्रभु के, उस परमात्मा के अंश हैं। तब कृष्ण ने कहा कि आप अपनी शक्ति को समेटिये, आपकी शक्ति इन सब पर दया करती रहेगी तो मरने वालों पर भी दया होती रहेगी। यह मरेंगे नहीं, एक भी मरेंगे नहीं, यह दुष्ट खत्म नहीं होंगे। तब जाकर उन्होंने दुष्टो का संघार किया था।आप समझो सब कुछ सन्तमत में कौन होते हैं? गुरु होते हैं।

गुरु ही ब्रह्मा गुरु ही विष्णु गुरु ही देवो महेश्वरा।।
गुरु साक्षात पारब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काकै लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविंद दियो बताए।।

यानी गोविंद यानी भगवान जिनको कहा गया वह भी खड़े हो जाएं तो सबसे पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए। गुरु को प्रणाम किया जाता है जिन्होंने भगवान की पहचान कराई।

बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥

गोस्वामी जी ने कहा कि जितने भी गुरु हुए हैं, सब लोगों ने गुरु को प्रणाम किया और कहा गुरु का ध्यान कर प्यारे बिना इसके नहीं छूटना। बगैर गुरु के ध्यान के छूट नहीं सकते हो। तो शुरू में गुरु का ही ध्यान करना पड़ता है।