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19.02.2021,छत्तीसगढ़ *वक़्त के शिक्षक, वैद्य और गुरु से ही काम बनता है-बाबा उमाकान्त जी महाराज*बीना:दुखहर्ता सन्त बाबा जय गुरु देव जी महाराज जी के आध्यत्मिक उत्तराधिकारी पूज्य सन्त बाबा उमाकान्त जी महाराज जी ने याद दिलाया की महापुरुषों के इस संसार से चले जाने के बाद लोग टेकी बन जाते हैं। जबकि यह बात अच्छी तरह जानने लायक है। कि पिछले महापुरुषों की याद करके उनसे प्रेरणा लेना अच्छी बात है। लेकिन डॉक्टर और गुरु हमेशा मौजूदा ही मिलने चाहिए। तब काम बनता है। जिसके पास गुण होता है उनके पास जाकर उनका दास यानी दीन बन कर लाभ उठा लेना चाहिए।*बहुत से लोग टेकी हो जाते है*जैसे कोई महापुरुष हुए, कोई सन्त हुए। उनके शिष्य बन गए। वह तो चले गए तो यह देखा गया की जिम्मेदारियां वह दूसरे को दे जाते हैं। गद्दी पर रहने वाले उन्हीं को जिम्मेदारी देते हैं जो काम जीवों का करते हैं, अध्यात्म का करते हैं। उनको देकर जाते हैं। कोई जरूरी नहीं है कि आसपास के लोगों को, गद्दी संभालने वाले को, वहां रहने वालो को दें।*वक्त के सतगुरु की जरूरत होती है, मुक्ति मोक्ष के लिये*अब वह तो चले गए। दूसरा काम करने लग गया। तब रुके नहीं। जैसे राम निकल पड़े जंगल-जंगल धर्म की स्थापना कर दिया। ऐसे ही जिनको काम मिलता है वह अपने काम में लग जाते हैं। लेकिन उनके नाम पर लोग मंदिर बना लेते हैं, चबूतरा बना लेते हैं, पंथ स्थापित कर लेते हैं। नाम को जो वह बताते हैं, वही रखते हैं लेकिन उस में तरक्की नहीं होती है। तरक्की क्यों नहीं होती है? क्योंकि दूसरे से मदद नहीं ले पाते हैं। जबकि संभाल करने वाले गुरु की जरूरत हमेशा हुआ करती है। प्रेमियों! आप इस बात को समझो जैसे इस समय पर कोई डॉक्टर मर गया। अब आपको तकलीफ हो गई रोग हो गया, मरे हुए डॉक्टर जिससे तुम्हारे पिताजी, दादाजी इलाज करा कर के ठीक हुए थे। अब कहो हम भी उनसे ही इलाज करा कर के ठीक हो जाएंगे तो कैसे ठीक हो सकते है?आपके पिताजी को, आपके परिवार वालों को, बुजुर्गों को पढ़ाया मास्टर ने, और अच्छे ओहदे पर पहुंच गए। अब आप कहो हम भी उसी से पढ़ें तो कैसे पढ़ पाओगे? आपको तो किसी मौजूदा वैद्य के पास, किसी मौजूदा मास्टर के पास, शिक्षक के पास जाना ही पड़ेगा। महाराज जी ने कहा की गुरु के मिशन के लिए जिसके अंदर जो अच्छाई हो उसका दास बन करके उससे वह चीज ले लो।*प्रेमियों!गुरु के मिशन के लिए किसी से भी सीख मिले तो ले लेनी चाहिए*बहुत से लोग अहंकार में आ जाते है कि गुरु हमको मिल गए, बाबाजी के हम शिष्य हैं, हम किसी से कोई कुछ नहीं, हम अल्लाह मियां हो गए। तो आप फंस जाते हो। आपको गुरु के मिशन के लिए दूसरे से अगर कोई सीख लेनी हो तो ले लेनी चाहिए। आपको समझने की जरूरत है कि आपको सीख मिले तो कहीं से भी ले लो। *राम मार नहीं सकते थे रावण को, उन्होंने दो कला परशुराम से लिया*राम रावण को मार नहीं सकते थे तब उस समय पर मौजूदा जो संत थे, जो शक्ति वाले थे परशुराम जी, दो कला राम ने उनसे लिया था, मांगा था कि हमको आप दे दीजिए जिससे हम अपना काम पूरा कर ले, इसका संहार कर दें। *जो गुरु के आदेश पर शिष्य चलता है गुरु रक्षा हमेशा करते हैं*आपको प्रेमियों समझने की जरूरत है। जब धनुष को राम तोड़ने गए थे तब सब कुछ उनके गुरु ने तोउनके अंदर भर दिया था लेकिन आप समझो कुछ तो शिष्य से ज्यादा गुरु के पास तो होता ही है। इतनी जल्दी सब चीजें गुरु से कोई जल्दी नहीं ले पाता है। जब जरूरत पड़ती है, गुरु अपने पास रखते हैं, उससे उसकी मदद कर देते हैं जो गुरु को अपना मानता है उनके आदेश पर चलता है।